केंद्र सरकार ने मंत्रालयों और विभिन्न विभागों के करीब 16.68 लाख आधिकारिक ईमेल अकाउंट्स को क्लाउड-बेस्ड प्लेटफॉर्म ज़ोहो पर माइग्रेट कर दिया है। इस पूरे प्रोजेक्ट पर अब तक लगभग 180.10 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
इस बारे में जानकारी देते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री जितिन प्रसाद ने संसद में बताया कि यह पहल सरकारी कामकाज को अधिक सुरक्षित, तेज और प्रभावी बनाने के लिए की गई है। उन्होंने कहा कि ईमेल आज के समय में प्रशासन और विभागों के बीच तालमेल का सबसे अहम माध्यम बन चुका है, इसलिए इसे आधुनिक बनाना जरूरी था।
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किस कंपनी को मिला प्रोजेक्ट?
इस क्लाउड प्लेटफॉर्म का संचालन जोहो कॉर्पोरेशन (Zoho Corporation) कर रही है, जिसे मास्टर सिस्टम इंटीग्रेटर के रूप में चुना गया। जितिन प्रसाद ने बताया कि कंपनी का चुनाव सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) के जरिए पूरी पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा के साथ किया गया। चयन प्रक्रिया में कंपनियों की तकनीकी क्षमता जांचने के लिए प्रूफ ऑफ कॉन्सेप्ट (PoC) भी किया गया, जिसके बाद Zoho को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।
सरकार के अनुसार, इस प्रोजेक्ट की लागत ईमेल अकाउंट्स की संख्या और उनकी स्टोरेज क्षमता पर निर्भर करती है। हर ईमेल अकाउंट पर प्रति माह 170 से 300 रुपये तक का खर्च आता है। यह कीमत 30GB से 100GB तक की मेलबॉक्स क्षमता के आधार पर तय की गई है। इस मॉडल से सरकार को जरूरत के हिसाब से खर्च करने की सुविधा मिलती है।
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सरकार का डेटा सुरक्षा पर जोर
सरकार ने साफ किया है कि सभी सरकारी डेटा का नियंत्रण पूरी तरह भारत सरकार के पास ही रहेगा। साथ ही, आधिकारिक ईमेल के लिए नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) की सेवाएं भी जारी रहेंगी। यह नया क्लाउड सिस्टम पुराने ढांचे को अपग्रेड करने, सुरक्षा बढ़ाने और बेहतर सहयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लागू किया गया है।
सरकार का मानना है कि यह पहल मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने के साथ-साथ देश में सुरक्षित और स्वदेशी डिजिटल सिस्टम विकसित करने की दिशा में भी अहम कदम है। आने वाले समय में इस तरह के डिजिटल बदलाव सरकारी कामकाज को और अधिक प्रभावी बना सकते हैं।











