ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। इससे निपटने की खातिर अमेरिका ने ईरान के तेल पर लगे प्रतिबंधों पर ढील दी है, ताकि कीमतों को स्थिर रखा जा सके। होर्मुज की खाड़ी से आवागमन सामान्य नहीं होने की वजह से एशियाई देशों में तेल का संकट खड़ा हो गया है। कई देशों को अपने यहां ईंधन वितरण में राशनिंग प्रणाली लगानी पड़ी। अमेरिका ने 19 अप्रैल तक ईरान को तेल बेचने की छूट दी है। उम्मीद है कि इस फैसले से बाजार में 140 मिलियन बैरल तेल आएगा, जिससे संकट को दूर करने में मदद मिलेगी।
28 फरवरी को युद्ध शुरू से पहले चीन ही ईरान का सबसे प्रमुख तेल खरीदार था। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद बीजिंग ने भारी मात्रा में ईरान से तेल खरीदा। वहीं भारत ने 2019 से कोई तेल नहीं खरीदा। मगर हाल ही में अमेरिकी प्रतिबंध हटने के बाद भारत ने ईरान से तेल खरीदना शुरू कर दिया है।
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महंगे दाम में भारत खरीद रहा तेल
कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि चीन को जाने वाला ईरानी तेल अब भारत जाने लगा है। प्रतिबंधों की वजह से चीन युद्ध से पहले एक इकलौता खरीदार था। मगर अब ईरानी तेल बाजार में भारत की एंट्री से समीकरण बिल्कुल बदल चुके हैं। ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के मुताबिक रिलायंस ने ईरान से 50 लाख बैरल कच्चा तेल ब्रेट ऑयल की तुलना में 7 डॉलर अधिक की कीमत पर खरीदा। वहीं आईओसी, बीपीसीएल और एचपीसीएल की रिफाइनरियां ईरान से दोबारा तेल खरीदने पर विचार कर रही हैं।
रियल-टाइम मैरीटाइम और एनालिटिक्स प्रदाता केप्लर से जुड़े होमायून फलकशाही का कहना है कि ईरान का कच्चा तेल अक्सर सिंगापुर या मलेशिया जैसे एशियाई डिस्चार्ज जोन तक पहुंचने से पहले कोई नहीं खरीदता था। अब भारत एक प्रतिस्पर्धी के तौर पर मैदान में उतर चुका है। इससे चीन में कीमत में बढ़ोतरी होने की पूरी संभावना है।
चीन का एकाधिकार खत्म, बढ़ सकती है कीमतें
अभी तक चीन औने पौने दाम पर ईरानी तेल खरीदता था, जबकि वैश्विक कीमत उससे कहीं अधिक थी। भारत के आने से ईरान के तेल पर चीन का एकाधिकार खत्म हो गया है। यही कारण है कि चीन को अब वैश्विक कीमत पर ही कच्चा तेल खरीदने पर मजबूर होना होगा। अगर ऐसा हुआ तो चीन में भारत के एक कदम से कीमत बढ़नी तय है। ईंधन में हुई मूल्य वृद्धि का असर चीन के कई अन्य सेक्टर पर भी होगा।
अमेरिका के वाणिज्य मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक इंटरव्यू में कहा कि ईरानी तेल पर बिक्री प्रतिबंधों में छूट से तेल की जरूरत वाले अन्य देशों जैसे भारत, जापान और मलेशिया को अधिक आपूर्ति की जा सकती है, जबकि चीन को बाजार मूल्य का भुगतान करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
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भारतीय रिफाइनरियों के पास व्यापक अनुभव
भारत के पास आधुनिक तेल रिफाइनरियां हैं। उनके पास रूस, खाड़ी देश, वेनेजुएला और ईरानी तेल शोधन का अनुभव है। 2019 से पहले भारतीय रिफाइनरियों ने नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी से समझौता किया था। इसके तहत प्रतिदिन लगभग 450,000 बैरल ईरानी कच्चे तेल का आयात करते थे।
छूट के तहत ईरानी तेल खरीदने पर भारतीय रिफाइनरियां जल्द ही अपने आपको उत्पादन के लिए ढाल सकती हैं। अमेरिका पर भी वैश्विक उर्जा आपूर्ति को सामान्य बनाने का दबाव है। ऐसे में अमेरिका भारत के साथ मिलकर ऊर्जा संकट को खत्म करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
भारत के पास रणनीतिक लाभ
खास बात यह है कि भारत के पास रणनीतिक लाभ भी है। चीन के खिलाफ अमेरिका ने अपने पैक्स सिलिका प्रोग्राम में भारत को शामिल किया है। इसका लक्ष्य आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में चीन की निर्भरता को कम करना है। आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित करना है। अब ऊर्जा संकट के बीच भारत वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को सुरक्षित बनाने में मदद कर सकता है। अमेरिका के साथ साथ रूस के साथ भी भारत के अच्छे रिश्ते हैं। इस वजह से ऊर्जा आपूर्ति में भारत ही विविधता लगा सकता है।










