HomeUncategorizedपापमोचनी एकादशी के दिन कौन-सी कथा पढ़नी चाहिए, जान लीजिए

पापमोचनी एकादशी के दिन कौन-सी कथा पढ़नी चाहिए, जान लीजिए


हिंदू धर्म में पापमोचनी एकादशी व्रत का बहुत महत्व है। इस दिन भगवान विष्णु के सभी रूपों का पूजन किया जाता है। पापमोचनी एकादशी का दिन बेहद खास माना जाता है, जो साल में एक ही बार आता है। पापमोचनी के दिन अक्सर लोग व्रत रखते हैं। हिंदू धर्म में मान्यता है कि पापमोचनी व्रत रखने वाला व्यक्ति अपने पापों से मुक्त हो जाता है। इस दिन व्रत रखने से लोगों को मन की शांति मिलती है। यह व्रत तभी सफल माना जाता है जब व्रत रखने वाला व्यक्ति पापमोचनी व्रत की कथा पढ़े या सुने। अगर कोई जातक इस दिन व्रत नहीं रखता है तो माना जाता है कि व्रत रखने के बावजूद उसे व्रत का पूरा फल नहीं मिलता है। इसलिए व्रत की कथा सुनना बेहद जरूरी है।


हिंदू पंचांग के मुताबिक चैत्र महीने में कृष्ण पक्ष में पड़ने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी कहा जाता है। इस बार पापमोचनी एकादशी 15 मार्च से शुरू होकर 16 मार्च की सुबह तक रहने वाली है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत में पूजा-पाठ के साथ-साथ कथा पढ़नी या सुननी चाहिए। धार्मिक मान्यता के हिसाब से यह व्रत कथा भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनाई थी, यही कथा हमें पढ़नी चाहिए। अब सवाल उठता है कि पापमोचनी व्रत की कथा क्या है।

 

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पापमोचनी व्रत कथा


कथा के अनुसार प्राचीन काल में चैत्ररथ नाम का एक सुंदर वन था। उस वन के आसपास रहने से हमेशा वसंत ऋतु का आनंद मिलता था। वन में हर मौसम में रंग-बिरंगे फूल खिलते थे। इसी वन के पास बैठकर एक ऋषि तपस्या किया करते थे, जो भगवान शिव के भक्त थे और गहरी साधना में हमेशा लीन रहते थे। एक दिन गंधर्वों के राजा चित्ररथ अपनी कई अप्सराओं के साथ उस वन के पास पहुँच जाते हैं।

 

उन अप्सराओं में एक अप्सरा का नाम मंजुघोषा था, जिसकी नजर मेधावी ऋषि पर पड़ती है। मंजुघोषा ने अपनी सुंदरता और मधुर संगीत के जरिए ऋषि को आकर्षित करने का निश्चय किया। वह ऋषि से कुछ दूरी पर बैठकर वीणा बजाने लगी और मधुर गीत गाने लगी। उसी वक्त कामदेव ने भी उसे ऋषि को मोहित करने में सहायता की। धीरे-धीरे मंजुघोषा के संगीत और रूप को देखकर ऋषि मेधावी का मन विचलित हो जाता है। वह अपनी तपस्या भूल जाते हैं और उसके साथ रहने लगते हैं। फिर समय बीतता गया और उन्हें इसका एहसास भी नहीं हुआ।

 

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लंबे समय बाद मंजुघोषा ऋषि मेधावी से स्वर्ग लौटने की इजाजत मांगती है। तब जाकर ऋषि को एहसास होता है कि 57 वर्ष बीत चुके हैं। यह जानकर उन्हें बहुत क्रोध आता है। उन्होंने मंजुघोषा को श्राप दे दिया कि वह पिशाचिनी बन जाएगी। श्राप सुनकर मंजुघोषा बहुत दुखी हो जाती है और ऋषि से क्षमा मांगने की कोशिश करती है। उसने कई बार विनती की कि उसे इस श्राप से मुक्त होने का कोई उपाय बताया जाए। कुछ देर बाद ऋषि मेधावी का क्रोध शांत होता है। फिर उन्होंने कहा कि अगर वह चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का व्रत रखेगी तो उसे इस श्राप से मुक्ति मिल जाएगी।

 

हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा से यह व्रत रखता है और इसकी कथा सुनता है, उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है। जीवन के कष्ट दूर हो जाते हैं और अनजाने में किए गए पापों से भी व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है।

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