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ना यूरोप-एशिया और ना ऑस्ट्रेलिया से मिला साथ, क्या अकेला पड़ गया है अमेरिका?


अमेरिका-इजरायल संयुक्त रूप से कुछ दिन पहले तक ईरान के साथ में युद्ध कर रहे थे। दोनों देशों ने ईरान को जान-माल का भारी नुकसान पहुंचाया है। अमेरिका का ट्रंप प्रशासन और इजरायल ने संयुक्त हवाई हमले का मुख्य लक्ष्य ईरान के परमाणु कार्यक्रम, मिसाइलों और सैन्य क्षमताओं को नष्ट करना है। साथ ही दोनों देश मिलकर ईरान में सत्ता परिवर्तन की भी कोशिशें कर रहे थे। सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई लेकिन ईरान ने दोनों देशों को मिसाइल और ड्रोन से ताबड़तोड़ जवाबी हमले किए। ईरान ने खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिका के कई एयर बेस को नेस्तनाबूत कर दिया और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होमुर्ज स्ट्रेट के सहारे पूरी दुनिया को अमेरिका पर दबाव डालने के लिए मजबूर कर दिया।

अमेरिका यूपोरीय संघ, रूस, चीन, ऑस्ट्रेलिया और जापान जैसे ताकतवर देशों के अनुरोध किया कि वह होमुर्ज स्ट्रेट को खुलवाने के लिए अमेरिका का साथ दें। मगर, अमेरिका की किसी भी देश ने नहीं सुनी और इस युद्ध में अमेरिका का साथ ना देकर एक तरह से ईरान का साथ दिया। ईरान ने अमेरिका के सामने घुटने टेकने से साफ इनकार कर दिया है। हालांकि, दवाब के कारण ही यह युद्ध दो हफ्तों के लिए रोक दिया गया है, ताकि अमेरिका और ईरान के साथ शांति का रास्ता निकाला जा सके। सवाल उठ रहे हैं कि अमेरिका का ना तो यूरोपीय देशों, ना एशियाई देशों और ना ही ऑस्ट्रेलिया-जापान ने साथ दिया, ऐसे में क्या अमेरिका अकेला पड़ गया है…

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ईरान और अमेरिका के बीच चल रही यह जंग सीधा फुल युद्ध नहीं है लेकिन लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव बहुत बढ़ा हुआ है। इस जंग में अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय समर्थन बहुत कम मिला है। इसकी कई वजहें हैं। इसमें सबसे पहली वजह यह है कि अमेरिका को उसके पुराने सहयोगियों ने ही समर्थन नहीं दिया, जिससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खार खाए हुए हैं। उनकी नाराजगी उनके आने आने वाले बयानों भी दिखाई देती है।

यूरोप ने बनाई दूरी

दरअसल, यूरोप के कई देश नाटो में शामिल हैं। नाटो को अमेरिका लीड करता है। माना जाता है कि नाटो में शामिल किसी भी देश पर हुआ हमला नाटो पर होता है, ऐसे में इसके सदस्य देश एक दूसरे का साथ देते हैं। इसमें शामिल ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन आदि ने अमेरिकी ठिकानों पर ईरान द्वारा किए गए जवाबी हमलों की निंदा की, लेकिन सभी ने खुद इससे दूर रखते हुए शामिल नहीं हुए। इनमें से कुछ देशों ने अमेरिका के लिए अपना एयरस्पेस या बेस का इस्तेमाल करने से भी मना कर दिया।

इस कदम के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने यूपोरीय देशों को कायर बता दिया। यूरोपीय देशों ने कहा कि यह युद्ध अनावश्यक रूप से लड़ा जा रहा युद्ध है। इसकी कोई जरूरत नहीं थी। इन कदमों ने यूरोप को अमेरिका से दूर कर दिया। यूरोप ठंडा रुख इसलिए भी अपना रहा है क्योंकि यूपोरीय संघ के देश सीधे मीलिट्री युद्ध नहीं चाहते हैं। सभी देश कुटनीति और परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करने के पक्ष में हैं। इसका साफ मतलब है कि यूरोप ने अमेरिका का समर्थन नहीं किया।

एशियाई देशों ने भी नहीं दिया समर्थन

इसके अलावा खाड़ी के देश सऊदी अरब, यूएई, बहरीन, ओमान अमेरिका की वजह से इस युद्ध में शामिल हो गए। ईरान ने इन देशों पर आक्रामक रूप से ड्रोन और बैलेस्टिक मिसाइस से हमले किए। दरअसल, इन देशों में अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। ईरान ने एयर बेसों, पानी प्लांट्स साथ में तेल के कुओं को निशाना बनाया। इन हमलों के बाद भी इन खाड़ी देशों ने अमेरिका का सार्वजनिक समर्थन नहीं किया और ना ही ईरान पर जवाबी हमला किया। इसमें खास बार यह भी है कि अगर खाड़ी देश ईरान पर हमला करते तो इजरायल से जुड़ा होने पर घरेलू जनता नाराज हो जाती।

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ईरान के हमलों से खुद इन देशों को नुकसान हुआ है, जिससे वे और सतर्क हो गए हैं। उन्होंने क्षेत्रीय सुरक्षा खुद संभालने की कोशिश की है। इसके अलावा रूस और चीन जैसे हर तरीके से ताकतवर देशों में इस जंग में ईरान का बैकडोर से खुलकर समर्थन किया है। दोनों देशों ने अमेरिका हमलों की कड़ी निंदा की।

अमेरिका में ही ट्रंप का विरोध

इसके अलावा ईरान पर हमले के बाद डोनाल्ड ट्रंप का अमेरिका में ही विरोध होने लगा है। लोगों का समर्थन लगातार ट्रंप के साथ कम हो रहा है। अमेरिकी मानते हैं कि यह युद्ध महंगा पड़ रहा है। इसमें अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं, इजरायल पर अमेरिका ज्यादा निर्भर दिख रहा है। अमेरकियों का यहां तक तक कहना है कि यह जंग इजरायल की है लेकिन लड़ अमेरिका रहा है। इन सबके खिलाफ ट्रंप के खिलाफ अमेरिका में लगभग एक करोड़ लोगों ने नो किंग्स प्रदर्शन किया।

ऑस्ट्रेलिया ने भी ईरान पर हमला करने पर पहले अमेरिका का समर्थन किया लेकिन अल्बानीज सरकार ने सीधे तौर पर इसमें सैन्य भागीदारी से दूरी बनाए रखी। ऑस्ट्रेलिया का मुख्य उद्देश्य ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को रोकना, क्षेत्रीय सुरक्षा और कुटनीति पर रहा।

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