नई दिल्ली। महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। एक ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को 21वीं सदी का ऐतिहासिक कदम बताते हुए इसके प्रभावी क्रियान्वयन का भरोसा दिलाया है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसके साथ जुड़े परिसीमन के मुद्दे पर गंभीर सवाल उठाकर सरकार को घेरा है।
विज्ञान भवन में आयोजित ‘नारी शक्ति वंदन सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह कानून न केवल महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में मील का पत्थर है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को भी नई मजबूती देगा। उन्होंने कहा कि संसद एक नए इतिहास के मुहाने पर खड़ी है, जहां अतीत के सपनों को साकार करते हुए भविष्य के संकल्पों को पूरा किया जाएगा।
प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि 16 अप्रैल से शुरू होने वाले संसद के विशेष सत्र में इस अधिनियम को लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने याद दिलाया कि 2023 में जब यह विधेयक पारित हुआ था, तब सभी राजनीतिक दलों ने सर्वसम्मति से इसका समर्थन किया था और अब इसे लागू करने की जिम्मेदारी भी सामूहिक है।
मोदी ने महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का उल्लेख करते हुए कहा कि आज देश में राष्ट्रपति से लेकर वित्त मंत्री तक महत्वपूर्ण पदों पर महिलाएं कार्यरत हैं। उन्होंने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की भूमिका को लोकतंत्र की बड़ी सफलता बताते हुए कहा कि देश में 14 लाख से अधिक महिलाएं स्थानीय निकायों में सक्रिय हैं और कई राज्यों में उनकी भागीदारी 50 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है।
प्रधानमंत्री ने अपने गुजरात के मुख्यमंत्री कार्यकाल का एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक ग्राम पंचायत की महिला प्रधान का यह संकल्प कि गांव में कोई गरीब न रहे, आज भी उन्हें प्रेरित करता है। उन्होंने कहा कि महिलाओं की भागीदारी से शासन में संवेदनशीलता और प्रभावशीलता दोनों बढ़ी हैं।
सरकार की विभिन्न योजनाओं का उल्लेख करते हुए मोदी ने बताया कि जनधन योजना के तहत करोड़ों महिलाओं को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा गया है, जबकि मुद्रा योजना के तहत 60 प्रतिशत से अधिक ऋण महिलाओं को दिए गए हैं। उन्होंने कहा कि स्टार्टअप क्षेत्र में भी महिलाओं की मजबूत उपस्थिति है और यह ‘वूमेन-लेड डेवलपमेंट’ की दिशा में बड़ा संकेत है।
हालांकि, इस पूरे मुद्दे पर विपक्ष का रुख सरकार से अलग नजर आ रहा है। सोनिया गांधी ने एक लेख के माध्यम से सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि असली चिंता महिला आरक्षण नहीं, बल्कि उससे जुड़ा परिसीमन है। उन्होंने इसे ‘बेहद खतरनाक’ और ‘संविधान पर हमला’ करार दिया।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार इस विषय पर पारदर्शिता नहीं बरत रही है और जल्दबाजी में निर्णय लेने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि विपक्ष लगातार सर्वदलीय बैठक की मांग कर रहा है, लेकिन उसे नजरअंदाज किया जा रहा है।
सोनिया गांधी ने यह भी सवाल उठाया कि यदि महिला आरक्षण को 2029 से लागू करना है, तो यह निर्णय पहले क्यों नहीं लिया गया। उन्होंने चेतावनी दी कि लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण में केवल जनसंख्या के आधार पर निर्णय लेने से उन राज्यों को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। इसके अलावा उन्होंने जातिगत जनगणना में देरी और 2021 की जनगणना टाले जाने पर भी सरकार की आलोचना की। उनका कहना था कि इससे नीतिगत निर्णयों और योजनाओं के क्रियान्वयन पर असर पड़ा है और करोड़ों लोग लाभ से वंचित रह सकते हैं।
राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस मुद्दे पर अब संसद के विशेष सत्र (16-18 अप्रैल) पर सभी की नजरें टिकी हैं। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक सुधार के रूप में प्रस्तुत कर रही है, वहीं विपक्ष इसे व्यापक राजनीतिक और संवैधानिक प्रभावों से जोड़कर देख रहा है। स्पष्ट है कि ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ केवल महिला सशक्तिकरण का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह आने वाले समय में राजनीतिक संतुलन, प्रतिनिधित्व और संघीय ढांचे की दिशा तय करने वाला बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है।











