HomeUncategorizedदूध से मसाले तक में मिलावट, आपकी सेहत पर असर क्या?

दूध से मसाले तक में मिलावट, आपकी सेहत पर असर क्या?


आजकल बाजार में खाने-पीने की चीजों में मिलावट का धंधा बहुत बढ़ गया है और यह हम सबके लिए एक बड़ी मुसीबत बन गया है। सरकारी संस्था एफएसएसएआई (FSSAI) की ‘एनुअल स्टेट सर्विलांस रिपोर्ट 2025-26’ के नए आंकड़ों से पता चला है कि पिछले दो सालों में मिलावट के मामले लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं। जानकारों का कहना है कि जब उन्होंने बाजार से खाने के सैंपल लेकर जांच की, तो हर 4 में से 1 चीज खराब या नकली पाई गई। यह हालत न सिर्फ हमारी सेहत बिगाड़ रही है, बल्कि इससे देश के पैसे और व्यापार का भी भारी नुकसान हो रहा है।

 

मिलावट करने वालों ने बड़े महानगरों से लेकर छोटे गांवों तक अपना काला कारोबार फैला रखा है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात जैसे राज्यों में हाल ही में पुलिस और प्रशासन ने मिलकर कई बड़ी छापेमारी की है। दिल्ली के नरेला और बवाना जैसे औद्योगिक इलाकों में नकली मसालों की ऐसी फैक्ट्रियां पकड़ी गई हैं जिन्हें देखकर अधिकारी भी हैरान रह गए। यहां मसालों का वजन बढ़ाने और उन्हें गहरा चटकीला रंग देने के लिए सड़े हुए चावल, लकड़ी का बुरादा, चॉक पाउडर और खतरनाक एसिड का इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा था।

 

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उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों और राजस्थान के कुछ इलाकों में ‘सिंथेटिक दूध’ बनाने के बड़े अड्डे मिले हैं। यहां असली दूध की एक बूंद भी नहीं होती, बल्कि यूरिया, कपड़े धोने वाला सर्फ (डिटर्जेंट), रिफाइंड तेल और ग्लूकोज का इस्तेमाल करके दूध जैसा दिखने वाला सफेद घोल तैयार किया जा रहा था। वहीं महाराष्ट्र के मुंबई और पुणे जैसे शहरों में पनीर और खोया में भारी मात्रा में मिलावट पाई गई है, जिसे त्योहारों और शादियों के सीजन में खपाने के लिए भारी मात्रा में स्टोर किया गया था।

इन रोजमर्रा की जरूरी चीजों में हो रही है सबसे ज्यादा मिलावट

सरकारी और निजी लैब की रिपोर्ट्स बताती हैं कि मिलावट का सबसे ज्यादा असर उन चीजों पर है जिन्हें हम रोज खाते हैं। दूध और डेयरी उत्पादों में सबसे ज्यादा यानी लगभग 35 प्रतिशत तक मिलावट पाई गई है, जिसमें पानी के अलावा ‘मल्टोडेक्सट्रिन’ और स्टार्च मिलाकर उसे गाढ़ा बनाया जाता है। मसालों की बात करें तो लाल मिर्च में ईंट का चूरा, हल्दी में कैंसर पैदा करने वाला ‘मेटानिल येलो’ रंग और धनिया पाउडर में घोड़े की लीद मिलाने के डरावने मामले सामने आए हैं। खाद्य तेलों में लगभग 15 से 20 प्रतिशत नमूनों में ‘आर्गेमोन तेल’ की मिलावट मिली है, जिससे आंखों की रोशनी जाने का खतरा रहता है। इसके अलावा, आजकल फल और सब्जियों को जल्दी पकाने और उन्हें एकदम ताजा दिखाने के लिए ‘कैल्शियम कार्बाइड’ और ‘मैलाकाइट ग्रीन’ जैसे खतरनाक एलिमेंट्स का स्प्रे किया जा रहा है। यह एलिमेंट्स  सीधे हमारे नर्वस सिस्टम और दिमाग पर हमला करते हैं, जिससे छोटी उम्र में ही लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।

सेहत पर पड़ता जानलेवा असर और पैसों का भारी नुकसान

मिलावट सिर्फ एक व्यापारिक धोखा नहीं है, बल्कि एक ऐसा धीमा जहर है जो धीरे-धारे हमारे शरीर के अंगों को बेकार कर रहा है। स्वास्थ्य एक्सपर्ट्स और डॉक्टरों का मानना है कि ऐसा खराब खाना लगातार खाने से कैंसर, किडनी फेलियर, लिवर की बीमारियां और दिल से जुड़ी समस्याएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। इसका सबसे बुरा असर छोटे बच्चों के विकास और बुजुर्गों की सेहत पर पड़ रहा है।

 

अगर इसे आर्थिक नजरिए से देखें, तो यह दोहरा नुकसान है। एक तरफ आम आदमी की मेहनत की कमाई बीमारी के इलाज और अस्पतालों के चक्कर काटने में बर्बाद हो जाती है। दूसरी तरफ, जब पूरी दुनिया में यह पता चलता है कि भारतीय मसालों या खाने की चीजों में मिलावट है, तो दूसरे देश हमारा सामान खरीदना बंद कर देते हैं। इससे भारत के व्यापार को करोड़ों का घाटा होता है और दुनिया भर में हमारे देश का नाम भी खराब होता है।

 

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बाजार का गिरता भरोसा और कानून की सख्त कार्रवाई

मिलावट के इस खेल ने बाजार से आम आदमी का भरोसा पूरी तरह हिला दिया है। लोग अब खुले और सस्ते सामान के बजाय मजबूरी में मंहगे ब्रांडेड उत्पादों की ओर भाग रहे हैं। इसका सीधा नुकसान उन छोटे और ईमानदारी दुकानदारों को हो रहा है जो शुद्ध सामान बेचना चाहते हैं लेकिन मिलावट के कम कीमत के आगे टिक नहीं पाते। कंज्यूमर रिपोर्ट के मुताबिक, मिलावट के डर से कई सेक्टर की ग्रोथ रेट पर भी बुरा असर पड़ा है।

 

इस गंभीर समस्या को देखते हुए सरकार ने अब ‘फूड सेफ्टी एक्ट’ के नियमों को और भी सख्त बना दिया है। नए नियमों के तहत अब मिलावट करने वालों  पर 10 लाख रुपये तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है और अगर मिलावट से किसी की जान को खतरा हो, तो उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। हालांकि, डॉक्टर्स का साफ कहना है कि सिर्फ कानून बनाने से यह धंधा बंद नहीं होगा। इसके लिए जमीनी स्तर पर हर महीने जांच होनी चाहिए और हम ग्राहकों को भी सामान खरीदते समय एफएसएसएआई (FSSAI) की मुहर और एक्सपायरी डेट को ध्यान से देखना चाहिए।

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