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पाकिस्तान: यूएस–ईरान वार्ता में क्या दांव पर और क्यों मुश्किल है समझौते की राह


डॉ.संजय पांडेय, इस्लामाबाद। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद इस सप्ताहांत एक अहम कूटनीतिक केंद्र में बदलने जा रही है, जहां अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को रोकने के लिए उच्चस्तरीय वार्ता होने वाली है। अल जजीरा के अनुसार यह बैठक उस तनावपूर्ण माहौल में हो रही है जब छह हफ्ते पहले अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद शुरू हुआ संघर्ष हजारों लोगों की जान ले चुका है, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को झटका दे चुका है और हॉर्मुज जलडमरूमध्य जैसे अहम समुद्री मार्ग को प्रभावित कर चुका है। हालांकि दो हफ्ते का युद्धविराम हुआ है, लेकिन इजरायल के लेबनान पर हमलों और शर्तों को लेकर मतभेदों ने इस वार्ता को शुरू होने से पहले ही जटिल बना दिया है।

व्हाइट हाउस ने पुष्टि की है कि औपचारिक बातचीत शनिवार सुबह पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुरू होगी। यह बैठक राजधानी के रेड जोन में स्थित सेरेना होटल में आयोजित होगी, जिसे पूरी तरह खाली कराकर सुरक्षा घेरे में लिया गया है। पाकिस्तान सरकार ने 9 और 10 अप्रैल को सार्वजनिक अवकाश घोषित कर दिया है और शहर में कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू की गई है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने संकेत दिया है कि वार्ता 15 दिनों तक चल सकती है, जिससे यह एक लंबी कूटनीतिक प्रक्रिया बन सकती है।

कौन-कौन होंगे शामिल

अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व उपराष्ट्रपति जेडी वेंस करेंगे, जिनके साथ ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और उनके दामाद जेरेड कुशनर शामिल होंगे। ईरान की ओर से संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाघेर गालिबाफ और विदेश मंत्री अब्बास अराघची भाग लेंगे। यह स्पष्ट नहीं है कि इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) का कोई प्रतिनिधि इसमें शामिल होगा या नहीं, जबकि यही संगठन युद्ध में ईरान की सैन्य रणनीति का नेतृत्व कर रहा है।

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कैसे होगी बातचीत

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ इस वार्ता की मेजबानी करेंगे और प्रारंभिक स्तर पर दोनों पक्षों से अलग- अलग मुलाकात करेंगे। वास्तविक बातचीत शटल डिप्लोमेसी, यानी दोनों पक्ष अलग कमरों में बैठेंगे और मध्यस्थ संदेश ले जाएंगे, के जरिए होगी, जिसे उपप्रधानमंत्री इशाक डार संचालित करेंगे। जेडी वेंस की मौजूदगी को अहम माना जा रहा है, क्योंकि ईरान उन्हें अपेक्षाकृत नरम रुख वाला नेता मानता है, खासकर तब जब पहले की वार्ताओं के दौरान यूएस ने हमले जारी रखे थे।

पाकिस्तान क्यों बना मध्यस्थ

पाकिस्तान हाल के हफ्तों में यूएस और ईरान के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बनकर उभरा है। पाकिस्तान के दोनों देशों से कार्यात्मक संबंध हैं, वह ईरान का पड़ोसी है और उसके यहां बड़ी शिया आबादी है, जिससे तेहरान के साथ उसका जुड़ाव मजबूत होता है। वहीं, अमेरिका के साथ भी पाकिस्तान नॉन-नाटो एलाय का दर्जा रखता है। राजनयिक सूत्रों के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ऐसे मध्यस्थ को प्राथमिकता दे रहे थे जो मुस्लिम देश होने के साथ ईरान का पड़ोसी भी हो और अमेरिकी पहल के अनुरूप लचीला तथा सहयोगी रुख अपनाने में सक्षम हो। इसके अलावा पाकिस्तान में अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी नहीं हैं, जिससे वह ईरान के लिए अपेक्षाकृत तटस्थ मंच बन जाता है।

क्या है एजेंडा और मुख्य विवाद

वार्ता में सबसे बड़ा मुद्दा ईरान का 10-सूत्रीय प्रस्ताव है, जिसमें हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण, मध्य पूर्व से अमेरिकी सैनिकों की वापसी और सहयोगी समूहों पर हमले रोकने जैसी मांगें शामिल हैं। इसके विपरीत, यूएस ईरान से अपने संवर्धित यूरेनियम (एनरिच्ड यूरेनियम) के भंडार को छोड़ने की मांग कर रहा है, जिसे उसने नों नेगोशिएबल बताया है। यानी इस पर कोई समझौता नहीं हो सकता।लेबनान इस वार्ता का सबसे बड़ा विवाद बनकर उभरा है। ईरान चाहता है कि इजरायल के हमले भी युद्धविराम के दायरे में आएं, जबकि यूएस इस बात से इनकार करता है। इस्राइल के हालिया हमलों में 200 से अधिक लोगों की मौत ने तनाव और बढ़ा दिया है।

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संभावित बाधाएं और नतीजे

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच गहरे अविश्वास के कारण तुरंत कोई बड़ा समझौता होना मुश्किल है। पाकिस्तान के पूर्व राजदूत मसूद खालिद ने अल जजीरा से कहा कि इजरायल की कार्रवाई वार्ता को पटरी से उतारने की कोशिश हो सकती है। वहीं, वाशिंगटन स्थित विश्लेषक सहर खान के अनुसार, विश्वास की कमी सबसे बड़ी बाधा है, लेकिन यदि दोनों पक्ष बातचीत शुरू कर देते हैं और युद्धविराम बना रहता है, तो यह एक महत्वपूर्ण पहला कदम होगा।एक और बड़ी चुनौती यह है कि इजरायल इस वार्ता का हिस्सा नहीं है, जबकि वह युद्ध का प्रमुख पक्ष है। विशेषज्ञों का मानना है कि उसकी अनुपस्थिति किसी भी संभावित समझौते को कमजोर कर सकती है।

क्या निकल सकता है रास्ता

हालांकि व्यापक शांति समझौता फिलहाल दूर दिखता है, लेकिन सीमित सहमति की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। परमाणु मुद्दे पर आंशिक समझौता और हॉर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने पर बहुपक्षीय सहमति बन सकती है, क्योंकि दोनों पक्ष युद्ध से थकान के संकेत दे रहे हैं। कुल मिलाकर, इस्लामाबाद की यह वार्ता एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है या फिर बढ़ते तनाव के बीच एक और असफल कूटनीतिक प्रयास। फिलहाल, दुनिया की नजरें इस बैठक पर टिकी हैं, जहां शांति और टकराव के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जाएगी।

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