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पीएम मोदी ने मिडिल ईस्ट जंग के बीच अचानक क्यों बुलाई हाई लेवल मीटिंग? क्या भारत उठाने वाला है बड़ा कदम

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मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में गहराते युद्ध के बाद पैदा हुए वैश्विक हालातों को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उच्च स्तरीय इमरजेंसी बैठक बुलाई है। प्रधानमंत्री आवास (7 LKM) पर चल रही इस बैठक ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है, क्योंकि इसमें देश की सुरक्षा और अर्थव्यवस्था से जुड़े तमाम बड़े चेहरे शामिल हैं। बैठक का प्राथमिक एजेंडा युद्ध के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चरमराई ‘सप्लाई चेन’ और भारत पर इसके संभावित असर की समीक्षा करना है। प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया है कि वैश्विक स्तर पर ऊर्जा संकट गहरा रहा है, जो किसी भी राष्ट्र के लिए एक गंभीर परीक्षा की घड़ी है। सरकार का पूरा जोर इस बात पर है कि युद्ध की आग चाहे कितनी भी भड़के, भारत के भीतर आम आदमी की रसोई से लेकर उद्योगों के पहियों तक ईंधन और बिजली की आपूर्ति में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए।

13 दिग्गज मंत्रियों की मौजूदगी: रणनीति और चौकसी का कड़ा पहरा

इस हाई-प्रोफाइल मीटिंग की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें मोदी कैबिनेट के 13 सबसे वरिष्ठ मंत्री एक साथ मौजूद हैं। बैठक में गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री एस. जयशंकर जैसे दिग्गज शामिल हैं, जो युद्ध के सामरिक और आर्थिक पहलुओं पर अपनी रिपोर्ट पेश कर रहे हैं। इनके साथ ही पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी, पीयूष गोयल, अश्विनी वैष्णव और शिवराज सिंह चौहान जैसे मंत्री भी मौजूद हैं, जो सीधे तौर पर रसद, ऊर्जा और कृषि क्षेत्र की कमान संभाल रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल और प्रधानमंत्री के दोनों प्रिंसिपल सेक्रेटरी भी इस मंथन का हिस्सा हैं। सरकार का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि कच्चे तेल और गैस के आयात पर युद्ध का कम से कम असर पड़े और देश में स्टॉक की कोई कमी न होने पाए।

भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

मौजूदा संकट की जड़ें 28 फरवरी को ईरान और इजराइल के बीच शुरू हुए सीधे टकराव में छिपी हैं। ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को बाधित किए जाने के बाद से वैश्विक ऊर्जा बाजार में खलबली मची हुई है। यह समुद्री मार्ग भारत समेत पूरी दुनिया के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया की लगभग 20 प्रतिशत ऊर्जा ढुलाई इसी संकरे रास्ते से होती है। ईरान ने यहाँ पोतों की आवाजाही पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए हैं, जिससे भारत आने वाले तेल और गैस के जहाजों के सामने अनिश्चितता का माहौल बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी इस खतरे को भांपते हुए पहले ही खाड़ी देशों समेत फ्रांस और इजराइल के राष्ट्रपतियों से फोन पर लंबी चर्चा कर चुके हैं। सरकार अब वैकल्पिक रास्तों और घरेलू भंडार के सही प्रबंधन पर काम कर रही है ताकि अंतरराष्ट्रीय बाधाओं के बावजूद भारतीय बाजारों में स्थिरता बनी रहे।

आम आदमी पर क्या होगा असर? 

युद्ध के इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में पेट्रोल, डीजल और बिजली महंगी होगी? इसी आशंका को खत्म करने के लिए प्रधानमंत्री ने ‘प्रो-एक्टिव’ रुख अपनाते हुए सक्रिय कदम उठाने के निर्देश दिए हैं। बैठक में फर्टिलाइजर (खाद) की सप्लाई पर भी विशेष चर्चा हुई है, क्योंकि इसका सीधा संबंध देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों से है। प्रधानमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि अंतरराष्ट्रीय बाधाओं से निपटने के लिए हर संभव कूटनीतिक और व्यापारिक रास्तों का उपयोग किया जाए। सरकार का मानना है कि धैर्य और सतर्कता के साथ इस वैश्विक व्यवधान से पार पाया जा सकता है। इस बैठक के बाद उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार जल्द ही ऊर्जा क्षेत्र को राहत देने के लिए कुछ बड़े नीतिगत फैसलों का ऐलान कर सकती है, जिससे महंगाई को काबू में रखने में मदद मिलेगी।

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