दुनिया भर में प्रोस्टेट कैंसर (Prostate Cancer) पुरुषों के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ने भी हाल ही में कहा था कि पुरुषों को इस बीमारी के प्रति जागरूक रहना चाहिए। अक्षय कुमार ने बताया है कि साल 2000 में उनके पिता की मौत भी इसी बीमारी के कारण हुई। उन्होंने इसका पता लगाने वाले प्रोस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन (PSA) टेस्ट कराते रहने की सलाह दी है। खासकर 50 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों को यह टेस्ट जरूर कराना चाहिए, वरना इसका पता तब चलता है जब यह गंभीर रूप ले चुका होता है।
साल 2020 के आंकड़ों के मुताबिक, पूरी दुनिया में इसके लगभग 14 लाख नए मामले सामने आए और 3.7 लाख लोगों की मौत हुई। भारत की स्थिति भी काफी चिंताजनक है, जहां इसी दौरान 34,540 नए केस दर्ज किए गए और 16,783 लोगों ने अपनी जान गंवाई। टाटा मेमोरियल सेंटर (ACTREC) की रिपोर्ट बताती है कि दक्षिण-मध्य एशिया में प्रोस्टेट कैंसर का 60% से ज्यादा बोझ अकेले भारत पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर समय पर जांच और इलाज पूरा किया जाए तो मरीज के बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
बॉलीवुड सुपरस्टार अक्षय कुमार ने हाल ही में पुरुषों को इस बीमारी के प्रति जागरूक रहने की सलाह दी है। अक्षय ने बताया कि साल 2000 में उनके पिता का निधन प्रोस्टेट कैंसर की वजह से ही हुआ था। उन्होंने भावुक होकर कहा कि उस समय उनके परिवार को पीएसए (PSA) टेस्ट के बारे में पता नहीं था। अक्षय के मुताबिक, अगर उनके पिता ने 50 साल की उम्र के बाद हर साल यह टेस्ट कराया होता, तो शायद आज वो उनके साथ होते। उन्होंने सभी पुरुषों से अपील की है कि वे अपनी सेहत को नजरअंदाज न करें और 50 की उम्र पार करते ही नियमित जांच करवाएं।
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बीमारी के चार चरण
प्रोस्टेट कैंसर के विकास को डॉक्टरों ने मुख्य रूप से चार चरणों में बांटा है। पहले और दूसरे चरण में कैंसर बहुत छोटा होता है और सिर्फ प्रोस्टेट ग्लैंड के अंदर ही सीमित रहता है, जिसे पीएसए टेस्ट के जरिए शुरुआती दौर में पकड़ा जा सकता है। तीसरे चरण में यह प्रोस्टेट की बाहरी दीवारों को तोड़कर पास के अंगों तक पहुंचने लगता है, जिससे लक्षण गंभीर होने लगते हैं। सबसे खतरनाक चौथा चरण होता है, जिसे ‘मेटास्टैटिक स्टेज'(Metastatic Stage) भी कहा जाता है। इसमें कैंसर हड्डियों, लिवर या फेफड़ों तक फैल चुका होता है। भारत में लगभग 50% मरीज इसी अंतिम स्टेज पर अस्पताल पहुंचते हैं, जिससे इलाज काफी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
बीमारी के लक्षण
भारत में सबसे बड़ी समस्या यह है कि शुरुआत में इसके लक्षण बहुत मामूली होते हैं, जिन्हें अक्सर बढ़ती उम्र का असर समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। मुख्य लक्षणों में पेशाब करने में कठिनाई होना, रात में बार-बार पेशाब आना, पेशाब या सीमन में खून दिखना और कूल्हे या हड्डियों में लगातार दर्द रहना शामिल है। टाटा मेमोरियल सेंटर की स्टडी के मुताबिक, जो मरीज अपना इलाज पूरा करते हैं, उनके बचने की कीमत उन लोगों से कहीं बेहतर है जो बीच में इलाज छोड़ देते हैं।
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सही समय पर इलाज और बचाव के तरीके
इस बीमारी से बचने के लिए 50 साल की उम्र के बाद नियमित पीएसए (PSA) टेस्ट करवाना सबसे कारगर तरीका है। यह एक साधारण ब्लड टेस्ट है जो कैंसर की शुरुआती आहट दे देता है। इसके अलावा, सरकार की विभिन्न आर्थिक योजनाओं का लाभ उठाकर भी इसका सही समय पर इलाज सुनिश्चित किया जा सकता है। एक्सपटर्स का मानना है कि सही खान-पान, ऐक्टिव लाइफस्टाइल और बीमारी के संकेतों को समझते ही तुरंत कैंसर सेंटर या विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करना ही इस साइलेंट किलर से बचने का सबसे सही रास्ता है।











