अमेरिका और ईरान के बीच शांति इस्लामाबाद में शांतिवार्ता हो रही है। ईरानी प्रतिनिधिमंडल पहुंच गया है, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पहुंचने वाला है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बागेर गालीबाफ इस डेलिगेशन का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके साथ विदेश मंत्री अब्बास अराघची और सेंट्रल बैंक गवर्नर अब्दोलनासेर हम्माती भी शामिल हैं।
मोहम्मद बागेर गालीबाफ ने कहा है कि हम अच्छे इरादे से आए हैं लेकिन अमेरिका पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि अमेरिका हर बार अपने वादे से मुकर गया है। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस डेलिगेशन का नेतृत्व कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप, शांति से ज्यादा हिंसा की बात कर रहे हैं।
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जेडी वेंस, उपराष्ट्रपति, अमेरिका:-
अगर ईरान अच्छे विश्वास से बातचीत करेगा तो हम भी खुले दिल से बात करेंगे। लेकिन अगर वे हमें धोखा देने की कोशिश करेंगे तो हम बातचीत सुनने के लिए तैयार नहीं होंगे।
डोनाल्ड ट्रंप के इरादे ईरान पर ठीक नहीं
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जेडी वेंस को शुभकामनाएं दीं लेकिन ईरान को धमकी देने से बाज नहीं आए। वह बार-बार जोर दे रहे हैं कि ईरान के पास कोई परमाणु हथियार नहीं होना चाहिए। उन्होंने ईरान को मिटा देने की धमकी भी दी और यह भी जता दिया कि ईरान, इसलिए जिंदा है क्योंकि शार्तिवार्ता होनी है। ट्रंप, ईरान को मिटाने की धमकी पहले भी दे चुके हैं।
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इजरायल और लेबनान फसाएंगे पेच?
वार्ता से पहले ईरान ने लेबनान में युद्धविराम के लिए अपनी शर्त रखी है। ईरान का कहना है कि लेबनान में सीजफायर के बिना वार्ता शुरू नहीं होगी। इजरायल ने साफ कहा है कि लेबनान के साथ होने वाली बातचीत में हिजबुल्लाह शामिल नहीं होगा और लेबनान में सीजफायर नहीं है। यह वार्ता, उलझने की जगह, फंसती जा रही है।
पाकिस्तान को उम्मीद क्यों है?
पाकिस्तान को सुलह का क्रेडिट, डोनाल्ड ट्रंप पहले ही दे चुके हैं। अब पाकिस्तान ने इन वार्ताओं की मेजबानी करने पर गर्व जताया है। इस्लामाबाद की सड़कों पर ‘इस्लामाबाद टॉक्स’ वाले बिलबोर्ड लगे हैं। पाकिस्तान, अब नए कूटनीतिक ताकत के तौर पर खुद को पेश कर रहा है।
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दुनिया को क्या उम्मीद है?
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने दोनों पक्षों से भरोसे के साथ बाचतीच करने की कवायद की है। वार्ता के दौरान परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध हटाने, हार्मुज स्ट्रेट को खोलने पर बात होगी।
क्यों शांति समझौता मुश्किल है?
दोनों पक्षों के बीच गहरी अविश्वास है। पिछले फरवरी में भी बातचीत चल रही थी जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमला शुरू कर दिया था। अभी यह साफ नहीं है कि इन वार्ताओं से कोई बड़ा समझौता होगा या नहीं। दोनों देश कम से कम मौजूदा युद्धविराम को बनाए रखना चाहते हैं। दुनिया भर की नजरें इस्लामाबाद पर टिकी हैं क्योंकि हार्मुज स्ट्रेट बंद रहने से तेल की आपूर्ति प्रभावित हो रही है।
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पाकिस्तान के लिए सेल्फ गोल कब साबित हो सकती है यह शांति वार्ता?
ईरान और अमेरिका के बीच संबंध, 90 के दशक से ठीक नहीं रहे हैं। दोनों देश, दशकों से टकराते रहे हैं। अमेरिका, बार-बार ईरान को मिटाने का दावा कर रहा है, डोनाल्ड ट्रंप, यहां तक कह चुके हैं कि ईरान सिर्फ इसलिए जिंदा है, क्योंकि संधि वार्ता के लिए राजी हुआ है, ऐसे दावे जंग को और उलझा रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप, राष्ट्रपति, ईरान:-
ईरान के पास होर्मुज स्ट्रेट का इस्तेमाल करके दुनिया को डराने का उनके पास कोई कार्ड नहीं है, वे आज जिंदा है तो सिर्फ बातचीत के लिए।
डोनाल्ड ट्रंप, एक तरफ शांति की बात कर रहे हैं, दूसरी तरफ मिटा देने की धमकी दे रहे हैं। पाकिस्तान अगर इस विवाद में कूदता है तो वह एक ऐसी स्थिति में आ सकता है कि कोई एक नाराज हो जाए। अगर अमेरिका खुश हुआ तो पड़ोसी ईरान नाराज होगा। अफगानिस्तान के साथ जंग में उलझा पाकिस्तान, ईरान से भी पंगा नहीं पाएगा।
पाकिस्तान की मुश्किल क्यों है यह मध्यस्थता?
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था नाजुक स्थिति में है। पाकिस्तान, वित्तीय मदद के लिए बड़े पैमाने पर अमेरिकी प्रभाव वाले अंतरराष्ट्रीय संस्थानों पर निर्भर है। अगर मध्यस्थता के दौरान अमेरिका को लगा कि पाकिस्तान ईरान के प्रति अधिक झुकाव रख रहा है तो आर्थिक और सैन्य मदद के लिए तरसना पड़ सकता है।
पाकिस्तान का आर्थिक मददगार, सऊदी अरब भी है। सऊदी और ईरान की भी नहीं बनती है। यह देश, क्षेत्रीय राजनीति में ईरान का कड़ा प्रतिद्वंदी रहा है। अब इस मध्यस्थता से रियाद के साथ पाकिस्तान के संबंधों में खटास आ सकती है। यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा कूटनीतिक नुकसान होगा। ईरान के हमलों में सऊदी अरब और दुबई को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है।
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क्या अपने लिए मुश्किलें सुलझा रहा है पाकिस्तान?
पाकिस्तान और ईरान के बीच सीमा विवाद है। बलूचिस्तान के आतंकियों को पनाह देने के लिए ईरान और पाकिस्तान के बीच 2025 में ही तनाव रह चुका है। कर्ज, आर्थिक बदहाली और आतंक से जूझकर पाकिस्तान, दो शक्तियों के बीच पिस सकता है। न तो ईरान, न ही डोनाल्ड ट्रंप के तेवर ऐसे हैं, जो किसी शांति की तरफ जाते दिख रहे हैं।
ईरान चाहता है कि इजरायल, लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ कार्रवाई रोके। इजरायल, इस शांति वार्ता को ही नहीं मान रहा है। ऐसे में अभी यह जंग सुलझने के बजाय और उलझ सकता है। पाकिस्तान का एक साथ, अमेरिका, ईरान और इजरायल से पंगा हो सकता है। खाड़ी के देश, जो पाकिस्तान का हमेशा साथ देते हैं, वे भी दूरी बना सकते हैं।











