नई दिल्ली। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा को लेकर जारी राजनीतिक विवाद अब और तेज हो गया है। इस मामले में लोकसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने खुलकर खेड़ा का समर्थन किया है। उन्होंने सोमवार को कहा कि कांग्रेस पार्टी अपने नेताओं के साथ मजबूती से खड़ी है और किसी भी तरह के दबाव या डर के आगे झुकने वाली नहीं है।
यह पूरा मामला उस समय और गंभीर हो गया जब असम सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए खेड़ा को मिली ट्रांजिट अग्रिम जमानत को चुनौती दी। इससे पहले तेलंगाना हाई कोर्ट ने 10 अप्रैल को पवन खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी। यह राहत उन्होंने इसलिए मांगी थी क्योंकि असम पुलिस उनसे पूछताछ के लिए दिल्ली स्थित उनके आवास पहुंची थी, लेकिन वे वहां मौजूद नहीं थे।
दरअसल, विवाद की शुरुआत 5 अप्रैल को हुई, जब पवन खेड़ा ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर गंभीर आरोप लगाए थे। खेड़ा ने दावा किया था कि मुख्यमंत्री की पत्नी के पास कई पासपोर्ट और विदेशों में संपत्तियां हैं, जिनकी जानकारी चुनावी हलफनामे में नहीं दी गई। हालांकि, सरमा और उनकी पत्नी ने इन आरोपों को पूरी तरह झूठा और निराधार बताया है।
इस मामले में रिनिकी भुइयां सरमा की शिकायत पर गुवाहाटी क्राइम ब्रांच में पवन खेड़ा के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। उन पर भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं के तहत चुनाव से जुड़े मामलों में गलत जानकारी देने और धोखाधड़ी जैसे आरोप लगाए गए हैं।
इसी बीच राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर बयान जारी करते हुए असम के मुख्यमंत्री पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि वर्तमान मुख्यमंत्री देश के सबसे भ्रष्ट नेताओं में से एक हैं और वे कानून से बच नहीं पाएंगे। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया कि सत्ता का दुरुपयोग कर राजनीतिक विरोधियों को परेशान किया जा रहा है, जो संविधान के खिलाफ है। उन्होंने मांग की कि पवन खेड़ा द्वारा उठाए गए सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, ताकि सच्चाई सामने आ सके।
दूसरी ओर, अदालत ने खेड़ा को राहत देते हुए कुछ शर्तें भी निर्धारित की हैं। इनमें गिरफ्तारी की स्थिति में एक लाख रुपये के निजी मुचलके पर रिहाई, जांच में पूरा सहयोग करना, जरूरत पड़ने पर पूछताछ के लिए उपस्थित होना और बिना अदालत की अनुमति देश छोड़कर न जाना शामिल है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने मामले के तथ्यों पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है, लेकिन गिरफ्तारी का खतरा देखते हुए सीमित राहत दी गई है।
फिलहाल यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर लगातार चर्चा में बना हुआ है, जहां एक ओर कांग्रेस इसे राजनीतिक दबाव बता रही है, वहीं असम सरकार आरोपों को गंभीर मानते हुए कानूनी कार्रवाई पर जोर दे रही है।












