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खुद को बचाने और दुश्मन को तबाह करने वाली इजरायल की मबाम रणनीति क्या है?

कभी आप ने सोचा कि इजरायल युद्धविराम का उल्लंघन क्यों करता है? जब सभी पक्ष शांत होते हैं तो अचानक उसकी सेना दुश्मनों के ठिकानों पर हमला क्यों कर देती है? युद्ध शुरू होता और बाद में अन्य देशों के दखल पर थम भी जाता है, लेकिन बीच-बीच में इजरायल की सेना अपने अभियान छेड़े रहती है। गाजा में शांति हुई तो लेबनान में संघर्ष तेज कर दिया। लेबनान में युद्धविराम हुआ तो ईरान के खिलाफ जंग शुरू कर दी। ईरान और अमेरिका में डील हुई तो दोबारा लेबनान में हिजबुल्लाह के खिलाफ भीषण बमबारी शुरू की। ऐसे में अब सवाल उठता है कि क्या यह इजरायल की सनक या उसकी कोई खास रणनीति। आखिर इजरायल ऐसा क्यों करता है? आइये इसे ही समझते हैं…

इजरायल की सेना और खुफिया एजेंसी कभी शांत नहीं बैठती हैं। ये पूरे मध्य पूर्व में फैले अपने दुश्मनों पर निगाह रखती हैं। खतरे को भांपती हैं और उनका आकलन करती हैं। अगर इजरायल के लिए कोई संकट जैसी स्थिति पैदा होने का सुराग मिलता है तो सेना और खुफिया एजेंसी उस लक्ष्य को निशाना बनाते हैं। हमला खुफिया कार्रवाई, सैन्य या साइबर किसी भी रूप में हो सकता है।

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इजरायल ने साल 2019 में इराक में स्थित एक शिया मिलिशिया से जुड़े हथियार डिपो पर अटैक किया। इस मिलिशिया को ईरान का समर्थन हासिल था। बताया जाता है कि इजरायली हमले में गाइडेड मिसाइल के उपकरण और ड्रोन भंडार तबाह हुआ था। यह हथियारों का जखीरा लेबनान में मौजूद हिजबुल्लाह तक पहुंचाया जाना था, लेकिन इजरायल ने उससे पहले ही हथियार भंडार को तबाह करके दुश्मन की सैन्य क्षमता पर बड़ा प्रहार किया। माना जाता है कि अगर इजरायल यह हमला नहीं करता तो हिजबुल्लाह का मिसाइल और ड्रोन जखीरा आज बेहद विशाल होता।

2020 में ईरान के एक एडवांस्ड सेंट्रीफ्यूज असेंबली सुविधा पर बड़ा धमाका हुआ। नतीजा यह हुआ कि सुविधा पूरी तरह से तबाह हो गई। दुनियाभर में इस हमले में इजरायल के शामिल होने शक जताया गया। यह भी दावा किया गया कि अगर सेंट्रीफ्यूज सुविधा पर हमला नहीं होता तो ईरान काफी पहले ही परमाणु बम विकसित करने की स्थिति में आ जाता।

सीरिया में इजरायल का सीक्रेट मिशन

सीरिया में इजरायल ने 2010 के दशक में हिजबुल्लाह के खिलाफ एक गुप्त अभियान चलाया। नतीजा यह हुआ कि संगठन को भारी नुकसान उठाना पड़ा, क्योंकि लेबनान की तरह सीरिया में उसके पास उन्नत सैन्य क्षमताएं नहीं थीं। आइये समझते हैं कि सीरिया में इजरायल ने हिजबुल्लाह को एक दशक पहले कैसे कमजोर किया था?

हिजबुल्लाह को इजरायल ने कैसे कमजोर किया?

  • हमले बमबारी करके
  • साइबर हमले
  • हथियारों की ज़ब्ती
  • खुफिया मिशन
  • सीरिया में ईरानी मिसाइल गोदामों पर अटैक
  • हथियारों के काफिले और खेप पर हमला
  • सीरिया में हिजबुल्लाह और आईआरजीसी पर हमला

क्यों लड़ी 12 दिनों की जंग?

पिछले साल जून महीने में इजरायल और ईरान के बीच 12 दिनों की जंग चली। ईरान के कई बड़े नेता और अधिकारी मारे गए। मिसाइल और ड्रोन सुविधाओं को तबाह किया गया। परमाणु स्थलों पर हमला हुआ। अचानक 12वें दिन जंगबंदी का ऐलान हो गया। इजरायल भी शांत बैठ गया और ईरान भी चुप पड़ गया। दुनिया दंग रह गई कि अचानक इतनी भीषण जंग कैसे रुक गई। मगर इसके पीछे भी इजरायल की खास रणनीति है।

पहले एक-एक दुश्मन को निपटाया… तब ईरान की तरफ हाथ बढ़ाया

ईरान पर हमले से पहले इजरायल ने गाजा में हमास को काफी हद तक खत्म। लेबनान में हिजबुल्लाह की टॉप लीडरशिप को समाप्त किया। 2024 में सीरिया की गद्दी से बशर अल असद के जाने के तुरंत बाद सीरिया की नौसेना और वायुसेना को 24 घंटे में खत्म कर दिया। कतर ने सीरिया में तुर्की के साथ प्रभाव बढ़ने की कोशिश की तो राजधानी दोहा पर मिसाइल दागकर इजरायल ने सीधी चेतावनी दी। बाद में यमन के हूती विद्रोहियों पर बड़ा हमला करके इजरायल ने ईरान के और हम सहयोगी को तबाह कर दिया।

जब इजरायल को लगा कि ईरान पर हमला करने का रास्ता लगभग साफ हो गया और सभी सहयोगी काफी कमजोर पड़ चुके हैं। तभी जून 2025 में अचानक पूरे ईरान में बमबारी कर दी। इन हमलों में ईरान की सैन्य क्षमताओं को गहरा झटका लगा। 12 दिन बाद युद्धविराम कर दिया, ताकि पूर्ण युद्ध न शुरू हो जाए और इजरायल को बड़ा नुकसान न उठाना पड़े।

दूसरा हमला आठ महीने बाद क्यों?

एक साल के भीतर यानी 28 फरवरी 2026 को अमेरिका के सहयोगी से दोबारा अटैक किया। करीब 40 दिनों तक प्रत्यक्ष जंग चली। पहले की अपेक्षा ईरान काफी कमजोर हो चुका है। अचानक अमेरिका ने युद्धविराम का एकतरफा ऐलान किया तो दुनिया को लगा शायद अमेरिका जंग से पीछे हट रहा है। मगर इसके पीछे इजरायल की दशकों पुरानी ‘मबाम’ रणनीति छिपी है।

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क्या है मबाम रणनीति, इसका लक्ष्य क्या है?

1950-60 के दशक में जॉर्डन, मिस्र, सीरिया और लेबनान में फिलिस्तीनी मुक्ति संगठन के खिलाफ सैन्य अभियान से इजरायल की मबाम रणनीति विकसित हुई। इस रणनीति का सबसे आम उद्देश्य दुश्मन की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना और तनाव को अधिक बढ़ने से रोकना है। मतलब दुश्मन पर हमला करो, लेकिन बात बिगड़ने से पहले स्थिति को संभाल ताकि पूर्ण युद्ध शुरू न हो सके। रणनीति का एक लक्ष्य है भी है कि एक जंग से दूसरी जंग के बीच जो शांतिकाल होता है उसमें सैन्य, साइबर और खुफिया अभियान से दुश्मन की सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना है।

इजरायल अब मबाम से आगे बढ़कर खतरों का और सक्रिय तौर पर सामना करेगा। अब खतरों को दबाने का कोई रास्ता नहीं है। अब मबाम जैसी कोई रणनीति नहीं है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू, इजरायली प्रधानमंत्री।

इजरायल एक बेहद छोटा और सीमित संसाधन वाला देश है। यही कारण है कि वह किसी भी देश के खिलाफ पूर्ण युद्ध से बचता है, क्योंकि दीर्घकाल में उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही कारण है कि इजरायली की सेना का भी मानना है कि पूर्ण पैमाने पर युद्ध से बचने की रणनीति की जरूरत होती है।

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