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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अधिवक्ता पर लगाया 20 हजार रुपये का हर्जाना, एक कोर्ट में बीमारी का बहाना और दूसरे में उपस्थिति का मामला

प्रयागराज । इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान गंभीर अनुशासनहीनता का मामला सामने आने पर एक अधिवक्ता पर सख्त रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी की एकलपीठ ने अधिवक्ता पर 20 हजार रुपये का हर्जाना लगाया और याचियों की अग्रिम जमानत अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि अधिवक्ता का यह आचरण न्यायालय को धोखा देने का प्रयास है, जो न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है।

घटना का विवरण
वाराणसी निवासी अरुण कुमार यादव तथा शिव प्रकाश सिंह ने वर्ष 2025 की पहली तिमाही में हाईकोर्ट में अग्रिम जमानत अर्जी दायर की थी। सुनवाई के दौरान याची के अधिवक्ता ने बीमारी की पर्ची भेजकर अनुपस्थिति दिखाई, लेकिन बाद में पता चला कि वे उसी समय दूसरे मामले की सुनवाई के लिए अलग कोर्ट में उपस्थित थे।कोर्ट ने टिप्पणी की कि जमानत अर्जी दाखिल करने की तारीख से अब तक प्रकरण को या तो याची/अधिवक्ता के अनुरोध पर स्थगित किया गया या अधिवक्ता अनुपस्थित रहे, सिवाय कुछ तारीखों के।

न्यायमूर्ति का कड़ा रुख
न्यायमूर्ति डॉ. गौतम चौधरी ने कहा कि अधिवक्ता का यह व्यवहार दर्शाता है कि वे न्यायालय को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। जब हाईकोर्ट प्रतिदिन बड़ी संख्या में नए मुकदमों से जूझ रहा है और पहले से ही मुकदमों के भारी बोझ तले दबा हुआ है, तब अधिवक्ताओं की जिम्मेदारी है कि वे सच्चे तथ्यों के साथ न्यायालय की सहायता करें। इससे न्यायालय का बहुमूल्य समय बचाया जा सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे आचरण को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता क्योंकि यह न्याय प्रक्रिया की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
अर्जी का फैसला
हाईकोर्ट ने अधिवक्ता पर 20 हजार रुपये का हर्जाना लगाने के साथ-साथ याची अरुण कुमार यादव और शिव प्रकाश सिंह की अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया। हर्जाना राशि हाईकोर्ट लीगल सर्विसेज कमिटी या संबंधित फंड में जमा कराने के निर्देश दिए गए।
महत्वपूर्ण संदेश
यह आदेश अधिवक्ताओं के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। इलाहाबाद हाईकोर्ट लगातार ऐसे मामलों में सख्ती बरत रहा है जहां वकील या याची न्यायालय का समय बर्बाद करते हैं या गुमराह करने का प्रयास करते हैं। कोर्ट ने जोर दिया कि अधिवक्ता न्यायालय के अधिकारी होते हैं और उन्हें न्याय प्रक्रिया में ईमानदारी से सहयोग करना चाहिए।यह घटना न्यायपालिका के बोझ को कम करने और पेशेवर नैतिकता बनाए रखने की दिशा में हाईकोर्ट के सक्रिय रवैये को दर्शाती है।

 

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