बस्ती में श्रीमद्भागवत कथा का समापन:राकेश त्रिपाठी ने सुनाया सुदामा चरित्र और रुक्मिणी विवाह

3
Advertisement

बस्ती के कप्तानगंज स्थित दुबौला के करमिया शुक्ल में आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ का समापन हो गया। अंतिम दिवस कथा व्यास राकेश त्रिपाठी ने भगवान श्रीकृष्ण के सुदामा चरित्र और श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का वर्णन किया। इस दौरान पंडाल में मौजूद श्रद्धालु भक्ति में लीन रहे और पूरा वातावरण “राधे-राधे” व “जय श्रीकृष्ण” के जयघोष से गूंज उठा। कथा व्यास राकेश त्रिपाठी ने सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा ने उज्जैन के गुरुकुल में एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी। उन्होंने गुरुमाता की सेवा, जंगल से लकड़ी लाने और कठिन परिस्थितियों में भी उनकी अटूट मित्रता के किस्से सुनाए। कथा व्यास ने जोर देकर कहा कि सच्ची मित्रता पद, प्रतिष्ठा और धन से कहीं ऊपर होती है। समय के साथ, श्रीकृष्ण द्वारिका के राजा बने, जबकि सुदामा अत्यंत निर्धन ब्राह्मण के रूप में जीवन व्यतीत कर रहे थे। घर की दयनीय स्थिति और पत्नी के आग्रह पर वे अपने मित्र से मिलने द्वारिका पहुंचे। कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने सुदामा को देखते ही सिंहासन से उतरकर उन्हें गले लगाया, स्वयं उनके चरण धोए और राजसी आसन पर बैठाया। भगवान ने सुदामा द्वारा लाए गए चावल (पोहे) को प्रेमपूर्वक स्वीकार किया। कथा व्यास ने इस दौरान कहा कि भगवान को भोग से अधिक भाव प्रिय होता है। द्वारिका से लौटने पर सुदामा ने पाया कि उनकी कुटिया महल में बदल चुकी थी और निर्धनता की जगह समृद्धि आ गई थी। इस प्रसंग के माध्यम से कथा व्यास ने यह संदेश दिया कि सच्चे मन से की गई भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। इसके बाद श्रीकृष्ण-रुक्मिणी विवाह का प्रसंग सुनाया गया। कथा व्यास ने बताया कि विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी ने भगवान श्रीकृष्ण को अपना पति स्वीकार कर लिया था, लेकिन उनके भाई रुक्मी ने उनका विवाह शिशुपाल से तय कर दिया था। रुक्मिणी के पत्र पर श्रीकृष्ण विदर्भ पहुंचे और उन्हें सम्मानपूर्वक द्वारिका ले जाकर वैदिक रीति से विवाह संपन्न किया। कथा के समापन अवसर पर मुख्य यजमान श्री राम सागर शुक्ला और श्रीमती रानी शुक्ला ने कथा व्यास राकेश त्रिपाठी की आरती उतारी। अंतिम दिन कथा सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उमड़े, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूबा रहा।
Advertisement