ममता बनर्जी को सुप्रीम कोर्ट की ‘सुप्रीम’ फटकार! ED की रेड के बीच अचानक मुख्यमंत्री की एंट्री और फिर जो हुआ… सन्न रह गई अदालत!
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर भूचाल आ गया है, लेकिन इस बार केंद्र और राज्य की लड़ाई सड़क से निकलकर देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक जा पहुंची है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) की एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के रवैये पर ऐसी सख्त टिप्पणी की है, जिसने पूरी टीएमसी (TMC) सरकार को बैकफुट पर धकेल दिया है। अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा कि जांच एजेंसी की छापेमारी के दौरान किसी राज्य के मुख्यमंत्री का मौके पर पहुंचना और हस्तक्षेप करना किसी भी सूरत में ‘अच्छी स्थिति’ नहीं है। न्यायमूर्ति ने गहरी चिंता जताते हुए पूछा कि अगर ऐसी असामान्य स्थितियां पैदा होती हैं, तो क्या केंद्रीय एजेंसियों के पास बचाव का कोई रास्ता नहीं होना चाहिए? यह पूरा मामला बंगाल चुनाव से पहले हुई एक हाई-प्रोफाइल रेड से जुड़ा है, जिसने अब कानूनी और राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है।
I-PAC के दफ्तर में क्या हुआ था? ED ने लगाए ‘सबूत मिटाने’ के संगीन आरोप
इस विवाद की जड़ें उस दिन से जुड़ी हैं जब ED की टीम कोयला घोटाला मामले की जांच के सिलसिले में चुनाव रणनीतिकार कंपनी I-PAC के दफ्तर और इसके प्रमुख प्रतीक जैन के ठिकानों पर छापेमारी करने पहुंची थी। ED ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर आरोप लगाया है कि जब अधिकारी अपनी ड्यूटी कर रहे थे, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अचानक वहां पहुंच गईं। एजेंसी का दावा चौंकाने वाला है—ED के मुताबिक, मुख्यमंत्री न केवल वहां पहुंचीं बल्कि जांच में बाधा डालते हुए मौके से एक लैपटॉप, मोबाइल फोन और कई महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने साथ ले गईं। ED ने इसे ‘सत्ता का गंभीर दुरुपयोग’ और ‘जांच को पटरी से उतारने की कोशिश’ करार दिया है। एजेंसी का तर्क है कि अगर संवैधानिक पदों पर बैठे लोग ही जांच में इस तरह दखल देंगे, तो भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई करना नामुमकिन हो जाएगा।
ममता बनर्जी का पलटवार: ‘यह छापेमारी नहीं, विपक्ष को दबाने की भाजपाई साजिश है’
इन गंभीर आरोपों और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी अपनी चुप्पी तोड़ी है। उन्होंने ED के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे पूरी तरह से ‘राजनीतिक रूप से प्रेरित’ बताया है। ममता बनर्जी का कहना है कि केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) चुनाव से पहले विपक्षी दलों पर दबाव बनाने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल एक हथियार की तरह कर रही हैं। टीएमसी खेमे का आरोप है कि I-PAC पर छापेमारी केवल इसलिए की गई ताकि चुनाव की रणनीति को समझा जा सके और विपक्ष को मानसिक रूप से कमजोर किया जा सके। ममता बनर्जी ने साफ किया कि वह किसी जांच के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन जिस तरह से एजेंसियों का ‘सियासी इस्तेमाल’ हो रहा है, उसके खिलाफ आवाज उठाना उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।
कोयला घोटाला और भविष्य की कानूनी लड़ाई: अब आगे क्या होगा?
ED ने स्पष्ट किया है कि I-PAC पर की गई यह कार्रवाई किसी राजनीतिक द्वेष का हिस्सा नहीं थी, बल्कि करोड़ों रुपये के कोयला घोटाला मामले में मिले पुख्ता सबूतों के आधार पर की गई थी। एजेंसी का कहना है कि जब्त किए जाने वाले दस्तावेज इस घोटाले की परतों को खोलने के लिए बेहद जरूरी थे। अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अगले आदेश पर टिकी हैं। क्या अदालत ममता बनर्जी के खिलाफ कोई कड़ा निर्देश जारी करेगी? या फिर राज्य और केंद्र की इस जंग में कोई नया कानूनी मोड़ आएगा? विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की यह ‘फटकार’ आने वाले समय में देश के संघीय ढांचे और जांच एजेंसियों की स्वायत्तता को लेकर एक नजीर पेश कर सकती है। फिलहाल, बंगाल की राजनीति में इस अदालती टिप्पणी ने गर्मी बढ़ा दी है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और भी तूल पकड़ सकता है।
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