ज्योतिष में भाग्योदय को लेकर बढ़ी लोगों की रुचि, कुंडली के नौवें भाव को माना गया सफलता का मुख्य आधार

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देशभर में ज्योतिष शास्त्र और कुंडली विश्लेषण को लेकर लोगों की दिलचस्पी लगातार बढ़ती जा रही है. खासतौर पर यह जानने की उत्सुकता अधिक देखी जा रही है कि किसी व्यक्ति का भाग्योदय कब और कैसे होता है. ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी व्यक्ति के जीवन में भाग्य का उदय मुख्य रूप से उसकी जन्म कुंडली के नौवें भाव, उसके स्वामी यानी भाग्येश और उस पर पड़ने वाले ग्रहों के प्रभाव पर निर्भर करता है. ज्योतिष शास्त्र में नौवें भाव को धर्म, भाग्य, गुरु और उन्नति का स्थान माना गया है और इसी भाव के अध्ययन से व्यक्ति के जीवन में सफलता के समय और माध्यम का आकलन किया जाता है.

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार भाग्योदय का समय निर्धारित करने के लिए कई महत्वपूर्ण आधार माने जाते हैं. इनमें ग्रहों की आयु, ग्रहों की दशा और अंतर्दशा तथा ग्रहों के गोचर को प्रमुख माना जाता है. ज्योतिष मान्यता के अनुसार प्रत्येक ग्रह की एक निश्चित आयु होती है जिसमें वह अपना पूर्ण प्रभाव देता है. यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में नौवें भाव का स्वामी ग्रह मजबूत स्थिति में होता है तो उस ग्रह की निर्धारित आयु में व्यक्ति के जीवन में उन्नति और सफलता के योग बनते हैं.

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार यदि बृहस्पति भाग्येश होता है तो व्यक्ति के जीवन में 16, 22 या 24 वर्ष की आयु में भाग्योदय के संकेत मिल सकते हैं. सूर्य के प्रभाव से 22 वर्ष की आयु में सफलता के अवसर बनने की संभावना मानी जाती है. चंद्रमा का प्रभाव 24 वर्ष के आसपास शुभ परिणाम देने वाला माना गया है. शुक्र ग्रह के मजबूत होने पर 25 वर्ष की आयु में भाग्य चमकने की संभावना बताई जाती है. मंगल ग्रह 28 वर्ष की आयु में महत्वपूर्ण परिणाम देने वाला माना जाता है. बुध ग्रह 32 वर्ष की आयु में उन्नति के अवसर प्रदान करता है, जबकि शनि ग्रह का प्रभाव 36 वर्ष की आयु के बाद स्थायी सफलता देने वाला माना जाता है. वहीं राहु और केतु के प्रभाव से 42 या 48 वर्ष की आयु के आसपास भाग्योदय होने की मान्यता भी प्रचलित है.

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विशेषज्ञों का कहना है कि केवल ग्रहों की आयु ही नहीं बल्कि दशा और अंतर्दशा भी भाग्योदय के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. जब किसी व्यक्ति की कुंडली में भाग्येश, धनेश यानी दूसरे भाव के स्वामी या लाभेश यानी ग्यारहवें भाव के स्वामी की महादशा या अंतर्दशा चलती है, तब व्यक्ति के जीवन में आर्थिक और सामाजिक उन्नति के योग मजबूत हो जाते हैं. ज्योतिषाचार्यों का मानना है कि इन ग्रहों की दशा के दौरान व्यक्ति को करियर, व्यापार और व्यक्तिगत जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं.

ज्योतिष में गोचर यानी ग्रहों के वर्तमान संचरण को भी भाग्योदय से जोड़ा जाता है. माना जाता है कि जब बृहस्पति ग्रह गोचर में किसी व्यक्ति की कुंडली के नौवें भाव, लग्न भाव या चंद्रमा के ऊपर से गुजरता है, तब व्यक्ति के जीवन में नए अवसरों के द्वार खुल सकते हैं. बृहस्पति को ज्ञान, उन्नति और शुभ परिणाम देने वाला ग्रह माना जाता है और इसके अनुकूल गोचर को जीवन में सफलता का महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है.

ज्योतिष विशेषज्ञों के अनुसार भाग्योदय केवल समय से ही नहीं बल्कि इस बात से भी तय होता है कि व्यक्ति के जीवन में सफलता किस माध्यम से आएगी. यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि भाग्येश ग्रह कुंडली के किस भाव में स्थित है. यदि भाग्येश लग्न भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति अपने प्रयास, मेहनत और व्यक्तित्व के बल पर सफलता प्राप्त करता है. ऐसे लोगों को आत्मनिर्भर और संघर्षशील माना जाता है.

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यदि भाग्येश चतुर्थ भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति को अपनी जन्मभूमि, माता या पैतृक संपत्ति के माध्यम से लाभ मिलने की संभावना रहती है. ऐसे लोगों को पारिवारिक सहयोग से उन्नति के अवसर मिलते हैं. वहीं यदि भाग्येश सप्तम भाव में स्थित हो तो ज्योतिष मान्यता के अनुसार विवाह के बाद व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं. माना जाता है कि जीवनसाथी का सहयोग ऐसे लोगों के भाग्योदय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि भाग्येश दशम भाव में स्थित होता है तो व्यक्ति को करियर, नौकरी, व्यापार या राजनीति के क्षेत्र में सफलता मिलने की संभावना अधिक रहती है. ऐसे लोग अपने कार्यक्षेत्र में पहचान बनाकर सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकते हैं. वहीं यदि भाग्येश बारहवें भाव में स्थित हो तो व्यक्ति का भाग्योदय अपनी जन्मभूमि से दूर या विदेश में जाकर होने की संभावना बताई जाती है. माना जाता है कि ऐसे लोगों को अपने घर या मूल स्थान पर संघर्ष करना पड़ सकता है, लेकिन विदेश या दूसरे स्थान पर उन्हें बेहतर अवसर मिल सकते हैं.

ज्योतिषाचार्य भाग्योदय को समझाने के लिए कई उदाहरण भी देते हैं. उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति की मेष लग्न की कुंडली में नौवें भाव का स्वामी बृहस्पति सप्तम भाव में स्थित हो तो ऐसे व्यक्ति का भाग्योदय विवाह के बाद होने की संभावना बताई जाती है. वहीं यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में शनि भाग्येश होकर नौवें भाव में स्थित हो तो शुरुआती जीवन में संघर्ष के बाद 36 वर्ष की आयु के बाद स्थायी सफलता मिलने की मान्यता बताई जाती है.

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ज्योतिष विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यदि किसी व्यक्ति को अपने जीवन में भाग्य का साथ नहीं मिल रहा है तो कुछ पारंपरिक उपायों के जरिए भाग्य को मजबूत करने का प्रयास किया जा सकता है. इनमें कुंडली के अनुसार भाग्येश ग्रह का रत्न धारण करना प्रमुख उपाय माना जाता है. हालांकि ज्योतिषाचार्य यह सलाह देते हैं कि किसी भी रत्न को धारण करने से पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी होता है.

इसके अलावा नौवें भाव को धर्म और गुरु का भाव माना जाता है, इसलिए माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करना भी भाग्य को मजबूत करने का महत्वपूर्ण उपाय बताया जाता है. ज्योतिष मान्यता के अनुसार बड़ों का आशीर्वाद व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सफलता के अवसर प्रदान कर सकता है. इसके साथ ही इष्ट देव की पूजा और धार्मिक आस्था को भी भाग्योदय से जोड़कर देखा जाता है.

हाल के वर्षों में ज्योतिष शास्त्र को लेकर लोगों की रुचि तेजी से बढ़ी है. कई लोग अपने करियर, विवाह, आर्थिक स्थिति और जीवन की दिशा को समझने के लिए कुंडली विश्लेषण का सहारा ले रहे हैं. हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि ज्योतिष केवल संभावनाओं का संकेत देता है और व्यक्ति की मेहनत, निर्णय क्षमता और परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता भी सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि भाग्य और कर्म दोनों का संतुलन जीवन में उन्नति के लिए जरूरी होता है. उनका मानना है कि सकारात्मक सोच, मेहनत और सही दिशा में प्रयास करने से व्यक्ति अपने जीवन में बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकता है. भाग्योदय को लेकर बढ़ती जिज्ञासा के बीच ज्योतिष शास्त्र आज भी समाज के बड़े वर्ग के लिए मार्गदर्शन का महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है.

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