अमेरिका में कार्यस्थलों की कथित उदार नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर एक बार फिर सामने आया है। ब्रेन कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे एक सोशल मीडिया प्रोफेशनल टायलर वेल्स ने अपनी छह अंकों की सालाना तनख्वाह वाली नौकरी छोड़ दी। वजह यह रही कि जिस कंपनी में वे काम कर रहे थे, वहां “अनलिमिटेड पीटीओ” यानी असीमित सवेतन अवकाश की नीति होने के बावजूद कीमोथेरेपी के लिए मांगी गई छुट्टियों को “दुरुपयोग” बताकर खारिज कर दिया गया। यह मामला सामने आते ही अमेरिका में कॉरपोरेट संस्कृति, श्रम कानूनों और कर्मचारियों के मानवीय अधिकारों पर तीखी बहस छिड़ गई है।
टायलर वेल्स एक नामी विज्ञापन एजेंसी में सोशल मीडिया प्रोफेशनल के रूप में कार्यरत थे। वर्ष 2024 में उन्हें ब्रेन कैंसर होने का पता चला। डॉक्टरों ने नियमित कीमोथेरेपी और इलाज के दौरान पर्याप्त आराम की सलाह दी। वेल्स का कहना है कि उन्होंने कंपनी से हर महीने दो से तीन दिन का सवेतन अवकाश मांगा था ताकि वे इलाज और रिकवरी को संतुलित कर सकें और काम भी जारी रख सकें। लेकिन कंपनी के प्रबंधन और मानव संसाधन विभाग ने इसे स्वीकार करने के बजाय कहा कि कीमोथेरेपी के लिए छुट्टी लेना “अनलिमिटेड पीटीओ” नीति का दुरुपयोग माना जाएगा।
वेल्स के मुताबिक, कंपनी ने उन्हें सवेतन अवकाश देने के बजाय फैमिली एंड मेडिकल लीव एक्ट के तहत बिना वेतन छुट्टी लेने का सुझाव दिया। अमेरिका का यह कानून गंभीर बीमारी की स्थिति में नौकरी की सुरक्षा तो देता है, लेकिन वेतन की कोई गारंटी नहीं देता। वेल्स ने बताया कि जब उन्होंने इलाज के दौरान काम जारी रखने के लिए अस्थायी कार्यस्थल सुविधाओं या लचीले काम के घंटों जैसी व्यवस्थाओं की मांग की, तो एचआर विभाग ने यह कहकर इनकार कर दिया कि वे ऐसी किसी सुविधा के लिए “बाध्य” नहीं हैं।
इस लगातार अस्वीकृति और मानसिक दबाव के बीच वेल्स ने आखिरकार नौकरी छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने एक्स पर अपनी आपबीती साझा करते हुए लिखा कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों पर पहले से ही भारी मानसिक और शारीरिक बोझ होता है। ऐसे समय में इलाज के दौरान बिल कैसे चुकाए जाएंगे, यह चिंता किसी को भी तोड़ सकती है। वेल्स का कहना है कि उन्हें लगा कि काम से ज्यादा अपनी सेहत और सम्मान को प्राथमिकता देना जरूरी है, इसलिए उन्होंने फुल-टाइम फ्रीलांसिंग का रास्ता चुना।
उनकी पोस्ट वायरल होते ही हजारों लोगों ने प्रतिक्रिया दी। कई यूजर्स ने “अनलिमिटेड पीटीओ” की अवधारणा पर सवाल उठाए और कहा कि यह नीति अक्सर कागजों पर आकर्षक लगती है, लेकिन व्यवहार में कर्मचारियों को छुट्टी लेने से हतोत्साहित करती है। कुछ लोगों ने अपने अनुभव साझा किए, जहां गंभीर बीमारियों के दौरान उन्हें न केवल वेतन से हाथ धोना पड़ा, बल्कि आर्थिक तंगी और बेघर होने जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा। कई यूजर्स ने वेल्स से उस कंपनी का नाम सार्वजनिक करने की मांग की, जबकि कुछ ने इसे पूरे सिस्टम की समस्या बताया।
इस पूरे मामले ने अमेरिकी कॉरपोरेट जगत में एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि क्या मौजूदा श्रम कानून और कार्यस्थल नीतियां गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों के लिए पर्याप्त हैं। आलोचकों का कहना है कि कंपनियां अक्सर उत्पादकता और मुनाफे को प्राथमिकता देती हैं और मानवीय संवेदनाओं को नजरअंदाज कर देती हैं। वेल्स ने अपनी पोस्ट में तीन अहम बिंदुओं पर जोर दिया—गंभीर बीमारियों का सामना कर रहे कर्मचारियों के लिए अधिक संवेदनशील नीतियां, कीमोथेरेपी जैसे इलाज के दौरान पूर्ण वेतन सुनिश्चित करने वाले मजबूत कानून और ऐसी कार्यसंस्कृति जो इंसान को मशीन नहीं समझे।
विशेषज्ञों का मानना है कि “अनलिमिटेड पीटीओ” जैसी नीतियां स्पष्ट दिशानिर्देशों के अभाव में कर्मचारियों को असुरक्षित बना देती हैं। जब छुट्टी की कोई तय सीमा नहीं होती, तो कर्मचारी यह समझ ही नहीं पाते कि कितनी छुट्टी लेना स्वीकार्य है। गंभीर बीमारी जैसी परिस्थितियों में यह भ्रम और भय और भी बढ़ जाता है। नतीजतन, कर्मचारी या तो काम छोड़ने को मजबूर होते हैं या अपनी सेहत को दांव पर लगाकर काम करते रहते हैं।
वेल्स का मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि यह दिखाता है कि उच्च वेतन और प्रतिष्ठित पद पर होने के बावजूद कोई भी कर्मचारी सिस्टम की कठोरता से अछूता नहीं है। उनका कहना है कि वे किसी एक कंपनी के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी कार्यसंस्कृति में बदलाव की मांग कर रहे हैं। उनका यह भी मानना है कि यदि समाज और सरकारें मिलकर श्रम कानूनों में सुधार नहीं करेंगी, तो गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों को हमेशा इसी तरह के विकल्पों—बिना वेतन छुट्टी या नौकरी छोड़ने—के बीच चुनना पड़ेगा।
इस घटना ने अमेरिका में कार्यस्थल करुणा और सामाजिक सुरक्षा के सवाल को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। जहां एक ओर कंपनियां कर्मचारी कल्याण की बात करती हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे मामले उस दावे की सच्चाई पर सवाल खड़े करते हैं। टायलर वेल्स की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उन अनगिनत कर्मचारियों की आवाज बन गई है जो बीमारी के समय नौकरी और जीवन के बीच कठिन चुनाव करने को मजबूर होते हैं।





























