बस्ती के मखौड़ा धाम में चैत्र पूर्णिमा से शुरू हुए दो दिवसीय मेले के पहले दिन दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं और साधु-संतों ने मनोरमा नदी में स्नान कर दान-पुण्य किया। इसके बाद उन्होंने मंदिर में पूजा-अर्चना की और रामजानकी मंदिर के दर्शन किए। साधु-संतों ने लिट्टी-चोखा बनाकर प्रसाद के रूप में लोगों में वितरित किया। मेले में जोगीरा, झूले और विभिन्न प्रकार की दुकानें सजी हुई थीं।मखौड़ा धाम में मेले की तैयारी कई दिनों पहले से शुरू हो गई थी, जिसके तहत दुकानें सजने लगी थीं। मनोरमा नदी में स्नान और मंदिर में पूजन-अर्चन करने वालों की भीड़ सुबह से ही उमड़ने लगी थी। दोपहर तक पूरा मेला परिसर श्रद्धालुओं से भर गया। मेले में लगे सर्कस और ड्रैगन झूले का बच्चों ने खूब आनंद लिया, वहीं मिट्टी के कलात्मक बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन और खिलौनों की दुकानों पर लोगों ने जमकर खरीदारी की। कई लोगों ने स्वयं भौरी और चोखा बनाकर प्रसाद ग्रहण किया और दूसरों को भी खिलाया।मेले की सुरक्षा व्यवस्था में तैनात पुलिसकर्मी पूरी तरह मुस्तैद रहे। प्रशासन द्वारा मेले में स्वास्थ्य शिविर भी लगाया गया था। परशुरामपुर थानाध्यक्ष विश्व मोहन राय अपनी टीम के साथ सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लेते रहे।परशुरामपुर ब्लॉक मुख्यालय से सटा मखौड़ा धाम पौराणिक रूप से काफी महत्वपूर्ण है। रामायण काल से ही चैत्र मास की पूर्णिमा को मखौड़ा धाम मंदिर परिसर में विशाल मेला लगता है। अगले दिन यहीं से देश के हजारों साधु-संत 84 कोसी परिक्रमा की शुरुआत करते हैं। उल्लेखनीय है कि त्रेता युग में अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति की कामना से गुरु वशिष्ठ की आज्ञा पर श्रृंगी ऋषि द्वारा पुत्रेष्टि यज्ञ मखौड़ा में मनोरमा नदी के किनारे कराया था। यज्ञ की पूर्णाहुति के बाद हवन कुंड से अग्नि देव पायस लेकर प्रकट हुए थे। उन्होंने राजा दशरथ को वह पायस सौंपकर तीनों रानियों को बराबर भाग खिलाने को कहा था, जिसके बाद तीनों रानियों को गर्भधारण हुआ और राजा दशरथ को राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न के रूप में चार पुत्रों की प्राप्ति हुई थी।
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मखौड़ा धाम में चैत्र पूर्णिमा मेला शुरू:मनोरमा नदी में स्नान, रामजानकी मंदिर में पूजा-अर्चना के लिए उमड़ी भीड़
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