HomeGadgetsचांद न दिखने पर क्या बढ़ जाता है रमजान का महीना?

चांद न दिखने पर क्या बढ़ जाता है रमजान का महीना?

इस्लामी कैलेंडर में एक महीना या तो 29 दिन का होता है या तो 30 दिन का। रमजान का महीना खत्म होने के लिए शव्वाल के महीने का चांद दिखना अनिवार्य है। यदि 29वें रमजान की शाम को चांद नहीं दिखता तो यह माना जाता है कि रमजान का महीना अभी पूरा नहीं हुआ है और अगला दिन यानी 30वां दिन भी उपवास मतलब रोजा रखा जाएगा।

धार्मिक मान्यताओं और वैज्ञानिक गणनाओं को अनुसार, चांद दिखना भौगोलिक स्थिति और मौसम पर निर्भर करता है। जब आसमान साफ न हो या चांद छोटा हो तो वह दिखाई नहीं देता। ऐसी स्थिति में ‘इतमाल’ यानी महीना पूरा करना के नियम के तहत रमजान को 30 दिनों का कर दिया जाता है जिसके अगले दिन ईद मनाई जाती है।

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चांद न दिखने पर क्या होता है?

इस्लामी शरीयत के अनुसार, महीनों का निर्धारण ‘रुयत-ए-हिलाल’ यानी चांद देखने पर टिका है। यह नियम पैगंबर मोहम्मद साहब की सुन्नत पर आधारित है, जिसमें चांद देखकर रोजा रखने और चांद देखकर ही ईद मनाने का निर्देश दिया गया है।

29 या 30 दिन का गणित: खगोलीय गणना के अनुसार, चंद्रमा को पृथ्वी का एक चक्कर पूरा करने में लगभग 29.5 दिन लगते हैं। इसी कारण इस्लामी महीनों में कभी 29 दिन होते हैं तो कभी 30। अगर 29वीं तारीख की शाम को नया चांद आसमान पर नजर आ जाता है तो नया महीना शुरू हो जाता है। अगर बादलों या अन्य कारणों से चांद नहीं दिखता, तो वर्तमान महीने को 30 दिन का माना जाता है।

शरीयत का नियम: इस्लामी कानून (शरीयत) के मुताबिक, इबादत के लिए गवाही या प्रत्यक्ष दर्शन जरूरी है। यदि 29 रमजान को चांद नहीं दिखता, तो यह माना जाता है कि चांद अभी अपनी उस स्थिति में नहीं आया है जहां से वह दिखाई दे सके। इसलिए, रमजान के 30 रोजे पूरे करना अनिवार्य हो जाता है।

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दुनिया भर में अलग-अलग समय: चूंकि चांद दिखने का समय भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है इसलिए दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में रमजान की शुरुआत और ईद की तारीख में एक दिन का अंतर अक्सर देखने को मिलता है।

ईद की तारीख में बदलाव: चांद न दिखने का सीधा मतलब है कि शव्वाल का महीना शुरू नहीं हुआ है। इसलिए ईद-उल-फितर अगले दिन के बजाय उसके बाद वाले दिन मनाई जाती है।

तरावीह की नमाज: यदि 29वें रोजे की शाम चांद नहीं दिखता, तो उस रात मस्जिदों में ‘तरावीह’ की विशेष नमाज पढ़ी जाती है, क्योंकि वह अभी भी रमजान का ही हिस्सा होता है।

नोट: इस खबर में लिखी गई बातें धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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