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ईरान से पारसियों के अनोखे मंदिर में 1300 साल से जल रही आग, इसी की होती है पूजा

ईरान से अपनी जान बचाकर भारत आए पारसी समुदाय के मंदिर दुनिया के सबसे रहस्यमयी और पवित्र धार्मिक स्थलों में से एक माने जाते हैं, जहां सदियों से एक ‘पवित्र अग्नि’ बिना बुझे जल रही है। इन मंदिरों को ‘अगियारी’ या ‘आतिश बेहराम’ कहा जाता है और इनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां किसी मूर्ति की नहीं बल्कि साक्षात् अग्नि की पूजा होती है। गुजरात के उडवाड़ा में बना ‘ईरानशाह आतिश बेहराम’ भारत का सबसे खास पारसी मंदिर है क्योंकि माना जाता है कि यहां जल रही आग वही है जिसे पारसी लोग करीब 1300 साल पहले ईरान से अपने साथ चिंगारी के रूप में लेकर आए थे।

पारसी समुदाय का इतिहास सिर्फ गुजरात तक ही सीमित नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत में भी इनकी विरासत बहुत पुरानी है। सिकंदराबाद के महात्मा गांधी रोड पर स्थित सेठ विक्काजी–सेठ पेस्टनजी मेहरजी मंदिर दक्षिण भारत का सबसे पुराना पारसी मंदिर है, जिसे 1847 में बनाया गया था।

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इसके ठीक सामने शहर का सबसे युवा मंदिर खान बहादुर एदुलजी सोहराबजी चेनाई अंजुमन दर-ए-मेहर स्थित है, जिसने साल 2020 में अपने 100 साल पूरे किए हैं। हैदराबाद के आबिड्स इलाके में साल 1904 में बना बाई मानेकजी नसरवानजी चेनॉय दर-ए-मेहर तीसरा मुख्य मंदिर है, जो उस समय वहां रहने वाले पारसी लोगों की सुविधा के लिए बनाया गया था।

हजारों साल से जल रही पवित्र आग

इन मंदिरों में जलने वाली आग को सिर्फ साधारण आग नहीं बल्कि ईश्वर का नूर माना जाता है। उडवाड़ा के मंदिर में मौजूद विजयी अग्नि को तैयार करने के लिए प्राचीन समय में 16 अलग-अलग स्नोतों से आग इकट्ठा की गई थी, जिसमें आसानी बिजली से लगी आग भी शामिल थी। मंदिर के दस्तूर यानी पुजारी दिन में पांच बार खास मंत्रों के साथ इस अग्नि की सेवा करते हैं और इसमें चंदन की सूखी लकड़ियां अर्पित की जाती हैं। यह आग कभी बुझने नहीं दी जाती क्योंकि इसे पारसी संस्कृति की जीवंत आत्मा माना जाता है।

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मंदिर के कड़े नियम और स्वच्छता

पारसी मंदिर में प्रवेश करने के नियम बहुत सख्त होते हैं और यहां स्वछता का स्तर बहुत ऊंचा होता है। मंदिर के मुख्य हिस्से में सिर्फ पारसी समुदाय के लोगों को ही जाने की इजाजत होती है ताकि वहां की आध्यात्मिक ऊर्जा और पवित्रता बनी रहे। अंदर जाने से पहले श्रद्धालु अपने हाथ-मुंह धोते हैं और सिर को टोपी या रुमाल से ढकना जरूरी होता है। मंदिर के अंदर कोई शोर-शराबा नहीं होता और भक्त शांत मन से पवित्र अग्नि की ओर मुख करके अपनी दुआएं मांगते हैं।

डिस्क्लेमर: यह लेख धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हम इसकी पुष्टि नहीं करते हैं।

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