उत्तर प्रदेश (UP) के इटावा जिले से एक ऐसी रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदात सामने आई है, जिसने न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोर दिया है, बल्कि आधुनिक युग में अंधविश्वास की गहरी जड़ों को भी उजागर किया है। यहाँ एक हंसते-खेलते परिवार की खुशियाँ उस वक्त मातम में बदल गईं, जब उनके ही घर के चिराग ने ‘दैवीय शक्ति’ के प्रभाव में आकर एक ऐसा आत्मघाती कदम उठाया जिसकी कल्पना मात्र से शरीर में सिहरन दौड़ जाती है। यह घटना केवल एक आत्महत्या नहीं है, बल्कि यह उस मानसिक अंधेरे की कहानी है जहाँ इंसान श्रद्धा और पागलपन के बीच की बारीक लकीर को पार कर जाता है। प्रत्यक्षदर्शियों की मानें तो युवक के चेहरे पर मौत का खौफ नहीं, बल्कि एक अजीब सी सनक थी, जिसके चलते उसने अपनी ही गर्दन को कुल्हाड़ी से अलग करने की कोशिश की।
भक्ति का उन्माद या अंधविश्वास का जानलेवा जाल?
इस खौफनाक मंजर की पटकथा कई दिनों से युवक के दिमाग में लिखी जा रही थी। परिजनों के अनुसार, 28 वर्षीय राजेश (बदला हुआ नाम) पिछले कुछ हफ्तों से सामान्य व्यवहार नहीं कर रहा था। वह घंटों तक चुपचाप बैठा रहता था और बीच-बीच में अजीबोगरीब बातें करता था। उसने अपने परिवार से कई बार कहा था कि उसे सपने में भगवान नजर आते हैं और वे उससे कुछ ‘बड़ा’ त्याग मांग रहे हैं। परिवार ने इसे उसकी गहरी धार्मिक आस्था समझकर नजरअंदाज कर दिया, जो कि उनकी सबसे बड़ी भूल साबित हुई। घटना वाले दिन राजेश अचानक घर के आंगन में आया और चिल्लाने लगा कि “महाकाल का बुलावा आ गया है, उन्हें अब मेरी बलि चाहिए।” इससे पहले कि कोई उसे पकड़ पाता या समझा पाता, उसने पास में रखी लकड़ी काटने वाली कुल्हाड़ी उठाई और पूरी ताकत से अपनी गर्दन पर वार कर दिया।
खून से सनी फर्श और बेबस अपनों की चीखें
जैसे ही कुल्हाड़ी राजेश की गर्दन पर चली, खून का फव्वारा फूट पड़ा और वह जमीन पर गिरकर तड़पने लगा। घर के भीतर मौजूद महिलाएं और बच्चे यह मंजर देखकर बदहवास हो गए। पूरे घर में चीख-पुकार मच गई और आस-पड़ोस के लोग भी भागकर मौके पर पहुंचे। मौके का दृश्य इतना डरावना था कि कमजोर दिल वालों की आंखों के आगे अंधेरा छा गया। आनन-फानन में युवक को चादर में लपेटकर नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने जांच के बाद उसे मृत घोषित कर दिया। डॉक्टरों का कहना था कि गर्दन की मुख्य नस कट जाने के कारण अत्यधिक रक्तस्राव हुआ, जिससे चंद मिनटों में ही उसकी जान चली गई। पुलिस को दी गई सूचना के बाद जब टीम मौके पर पहुंची, तो वहां की स्थिति देखकर अनुभवी पुलिसकर्मी भी सन्न रह गए।
मानसिक तनाव और सामाजिक अनदेखी का घातक मेल
पुलिस की प्रारंभिक जांच में यह मामला प्रथम दृष्टया अंधविश्वास और गंभीर मानसिक तनाव (Mental Health Issue) का लग रहा है। अक्सर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में मानसिक बीमारियों को ‘ऊपरी चक्कर’ या ‘देवता का प्रकोप’ मान लिया जाता है, जिससे मरीज को सही इलाज के बजाय झाड़-फूंक या गलत धार्मिक क्रियाओं की ओर धकेल दिया जाता है। राजेश शायद किसी गंभीर मनोवैज्ञानिक विकार से जूझ रहा था, जिसे ‘रिलीजियस डेल्यूजन’ कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को लगता है कि ईश्वर उससे सीधे बात कर रहे हैं और उसे नुकसान पहुंचाने का आदेश दे रहे हैं। पुलिस ने शव का पोस्टमार्टम कराकर परिजनों को सौंप दिया है, लेकिन इस घटना ने पीछे कई अनुत्तरित सवाल छोड़ दिए हैं। क्या हम वास्तव में 21वीं सदी में जी रहे हैं, जहाँ एक नौजवान अंधविश्वास की भेंट चढ़ जाता है?
एक चेतावनी: अपनों के व्यवहार पर रखें पैनी नजर
इटावा की यह हृदयविदारक घटना समाज के लिए एक बड़ी चेतावनी है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आपके परिवार का कोई सदस्य अचानक अपनी दिनचर्या बदल ले, रहस्यमयी बातें करने लगे या खुद को नुकसान पहुंचाने की बात कहे, तो उसे धार्मिक मामला मानकर चुप न बैठें। यह किसी बड़े मानसिक संकट का संकेत हो सकता है। फिलहाल, इटावा का वह गांव शोक में डूबा है और हर कोई उस खौफनाक पल को याद कर सिहर उठता है जब राजेश ने महाकाल के नाम पर अपनी ही बलि चढ़ा दी। पुलिस मामले की फाइल बंद करने की तैयारी में है, लेकिन मृतक के परिवार के लिए यह कभी न भरने वाला जख्म बन गया है। शासन-प्रशासन भी अब ग्रामीण इलाकों में जागरूकता अभियान चलाने की बात कह रहा है ताकि भविष्य में कोई और राजेश अंधविश्वास की वेदी पर न चढ़े।
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