नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश संबंधी मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने मंगलवार को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि किसी महिला को तीन दिन अछूत मानकर चौथे दिन अछूत नहीं माना जा सकता। यह टिप्पणी 2018 के सबरीमाला फैसले पर केंद्र सरकार की आपत्ति के जवाब में आई, जिसमें 10 से 50 वर्ष की महिलाओं को मंदिर प्रवेश से रोकने को अनुच्छेद 17 के तहत अछूत प्रथा से जोड़ा गया था।
सुनवाई के दौरान क्या हुआ
सबरीमाला मामले की समीक्षा याचिकाओं पर 9 जजों की संविधान पीठ सुनवाई कर रही है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 2018 के फैसले की उस टिप्पणी पर आपत्ति जताई जिसमें कहा गया था कि उम्र के आधार पर महिलाओं को मंदिर में प्रवेश से रोकना अछूत प्रथा के बराबर है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने महिला न्यायाधीश के नजरिए से कहा कि “तीन दिन हर महीने अछूत जैसा व्यवहार करना और चौथे दिन इसे बंद करना तर्कसंगत नहीं है।” उन्होंने जोर दिया कि सामाजिक कुरीतियों को धार्मिक प्रथा का रंग देकर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।
अनुच्छेद 17 पर चर्चा
जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि सबरीमाला विवाद में अनुच्छेद 17 (अछूत प्रथा का निषेध) को कैसे लागू किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि यदि कोई सामाजिक बुराई को धार्मिक प्रथा का रूप दिया जाता है, तो अदालत निश्चित रूप से दोनों के बीच अंतर कर सकती है।
सॉलिसिटर जनरल ने दलील दी कि सबरीमाला मंदिर में प्रतिबंध उम्र आधारित है, न कि मासिक धर्म पर। लेकिन जस्टिस नागरत्ना ने मासिक धर्म संबंधी टैबू पर सवाल उठाते हुए कहा कि भारत पितृसत्तात्मक या लैंगिक रूढ़ियों वाला देश नहीं है, जैसा पश्चिम समझता है।
मामले का संदर्भ
2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। अब इस फैसले की समीक्षा हो रही है और 9 जजों की बड़ी पीठ धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश, धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार जैसे व्यापक संवैधानिक मुद्दों पर सुनवाई कर रही है।
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क्या कहा गया और आगे क्या
जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी ने सुनवाई में महिला अधिकारों और धार्मिक प्रथाओं के बीच संतुलन पर गहरी बहस छेड़ दी है। अदालत इस मामले में सामाजिक कुरीतियों को धार्मिक आस्था से अलग करने पर जोर दे रही है।
सुनवाई अभी जारी है और इस पर अंतिम फैसला आने में समय लग सकता है। यह मामला न केवल सबरीमाला मंदिर बल्कि देश के अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को भी प्रभावित कर सकता है।
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