लखनऊ। 19 अप्रैल, 2026 उत्तर प्रदेश के कृषि निदेशक डॉ० पंकज त्रिपाठी ने प्रदेश के किसानों से मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए हरी खाद को बढ़ावा देने का आह्वान किया है। उन्होंने बताया कि फसलों से अधिकतम उत्पादन प्राप्त करने के लिए मिट्टी में जीवांश कार्बन की उपलब्धता अनिवार्य है। वर्तमान में प्रदेश की मृदा में जीवांश कार्बन की मात्रा मात्र 0.2 से 0.3 प्रतिशत रह गई है, जिसे बढ़ाकर 0.8 से 1 प्रतिशत तक ले जाने की आवश्यकता है।
रासायनिक उर्वरकों जैसे यूरिया और डी.ए.पी. के अत्यधिक प्रयोग तथा गर्मी में जुताई न करने के कारण मिट्टी से मित्र कीट और केंचुए गायब हो रहे हैं, जिसका सीधा असर उत्पादन और उर्वरकों की बढ़ती मांग पर पड़ रहा है।
कृषि निदेशक डॉ० पंकज त्रिपाठी ने जानकारी दी कि दलहनी और गैर-दलहनी फसलों को उनकी वानस्पतिक वृद्धि के समय मिट्टी में दबाना ही हरी खाद है। इसके लिए ढैंचा, सनई, लोबिया, ग्वार और मक्का जैसी फसलों का चयन किया जा सकता है। ये फसलें अपनी जड़ ग्रंथियों में उपस्थित जीवाणुओं के माध्यम से वातावरण की नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करती हैं। किसान भाइयों को वर्ष में कम से कम एक बार इन फसलों की बुवाई कर 30 से 40 दिन के भीतर इन्हें मिट्टी में पलट देना चाहिए। इससे मृदा में न केवल जैविक पदार्थों की वृद्धि होगी, बल्कि सूक्ष्म जीवों की क्रियाशीलता और पोषक तत्वों जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश की उपलब्धता भी बढ़ेगी।
डॉ० त्रिपाठी ने बताया कि अप्रैल और मई की भीषण गर्मी में खेतों को हरी खाद की फसलों से ढकने से ऊसर बढ़ने की आशंका कम होती है और आगामी फसलों के लिए भूमि तैयार हो जाती है। कृषि विभाग इस दिशा में किसानों की सहायता हेतु ढैंचा और मिश्रित हरी खाद के बीज के पैकेट 50 प्रतिशत अनुदान पर उपलब्ध कराने की योजना बना रहा है। इच्छुक किसान कृषि विभाग के पोर्टल पर अपना पंजीकरण कराकर इन बीजों को प्राप्त कर सकते हैं। हरी खाद के इस प्रयोग से न केवल रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी, बल्कि खेती की लागत में भी प्रभावी बचत सुनिश्चित की जा सकेगी।












