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अमोढ़ा की रानी तलाश कुंवरि ने 1857 से पहले जगाई:अंग्रेजों से लोहा लेते हुए खुद को कटार से शहीद किया

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अमोढ़ा रियासत की अंतिम शासक महारानी तलाश कुंवरि ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया था। उन्होंने अपनी जान की आहुति देकर देश के लिए बलिदान दिया, जिसकी यादें आज भी क्षेत्र में जीवित हैं। महारानी तलाश कुंवरि ने 1852 में अपने पति महाराजा जंगबहादुर सिंह के निधन के बाद सत्ता संभाली थी। इसी दौरान अंग्रेजों की नजर अमोढ़ा राज्य पर पड़ी, और यह रियासत लॉर्ड डलहौजी की राज्य हड़प नीति का शिकार हो गई। अंग्रेजों ने महारानी को विभिन्न तरीकों से परेशान करना शुरू कर दिया था। जब देशी रियासतों के संघ ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बजाया, तो अमोढ़ा राज्य भी उसमें शामिल हो गया। यह लड़ाई अंतिम मुगल शासक बहादुरशाह जफर के नेतृत्व में शुरू हुई थी, जिसके कारण अंग्रेजी सेना की सीधी नजर देशी रजवाड़ों की गतिविधियों पर थी। अंग्रेजों ने रानी के विद्रोह को कुचलने के लिए 1858 में कर्नल ह्यूज के नेतृत्व में ब्रिटिश फौज को बीरपुर के पास अमोढ़ा रियासत पर आक्रमण करने भेजा। रानी और उनके सैनिकों ने वीरता से मुकाबला किया, लेकिन वे अंग्रेजी सेना के सामने टिक नहीं सके। रानी ने यह प्रण लिया था कि वह जीवित अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगी। इसी संकल्प के तहत, लड़ते-लड़ते वह पखेरवा कुंवर समय भवानी स्थान पर पहुंच गईं। वहां उन्होंने अपने सिपाहसालारों से कहा कि अब प्राण बचाना मुश्किल है। इसके बाद, उन्होंने अपनी ही कटार अपनी छाती में घोंप ली और 2 मार्च 1858 को शहीद हो गईं। रानी की शहादत के बाद अंग्रेजी सेना ने दमनचक्र चलाया। बड़ी संख्या में रानी के सैनिक पकड़े गए। अंग्रेजों ने डेढ़ सौ सैनिकों को छावनी में पीपल के पेड़ से लटकाकर मौत के घाट उतार दिया। अंग्रेजों का खौफ इतना था कि एक महीने तक शहीदों के शव पेड़ से लटके रहे, और किसी की हिम्मत नहीं हुई कि उन्हें उतार सके। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षक हाकिम सिंह ने अपनी किताब “स्वतंत्रता संग्राम में अमोढ़ा राज्य का गौरवशाली योगदान” में रानी की वीरगाथा का वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि रानी तलाश कुंवरि ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम शुरू होने से पहले ही बस्ती क्षेत्र में स्वतंत्रता की अलख जगा दी थी, जिसके कारण वह अंग्रेजों की कट्टर दुश्मन बन गई थीं।
#बस्ती न्यूज़ टुडे

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