- संन्यास केवल वस्त्र परिवर्तन नहीं बल्कि वृत्ति परिवर्तन
- सन्यास “ममत्व” से “समत्व” की ओर, “अहं” से “ब्रह्म” की ओर अग्रसर होने की यात्रा : चिदानन्द सरस्वती
ऋषिकेश। महामण्डलेश्वर आचार्य प्रवर अनन्त विभूषित युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरि महाराज का 71वाँ संन्यास जयंती महोत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ आयोजित हुआ। जिसमें पूज्य संतों, महंतों, विशिष्ट विभूतियों और राजनीतिज्ञों की गरिमामयी उपस्थिति रही।
धर्म, अध्यात्म, सेवा और सनातन संस्कृति के उज्ज्वल प्रेरणास्तंभ परम पूज्य महामण्डलेश्वर आचार्य प्रवर अनन्त विभूषित युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरि महाराज के 71वें संन्यास जयंती महोत्सव का आयोजन अत्यंत श्रद्धा, भव्यता एवं दिव्यता के साथ मनाया गया। पूज्य संतों का संन्यास जीवन की त्याग, तप, साधना, सेवा और लोकमंगल की अखंड यात्रा का दिव्य उत्सव है।
स्वामी परमानन्द गिरि जी महाराज ने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र, धर्म और मानवता के कल्याण हेतु समर्पित किया। उन्होंने वेद, उपनिषद, गीता एवं सनातन ज्ञान परंपरा के आलोक को जन-जन तक पहुँचाने का महनीय कार्य किया है। 71वाँ संन्यास जयंती महोत्सव विविध आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजनों से युक्त था जिसका शुभारम्भ वैदिक मंत्रोच्चार, पूजन-अर्चन एवं गुरु वंदना के साथ किया। इसके पश्चात संत-महात्माओं, विद्वानों एवं भक्तजनों द्वारा पूज्य गुरुदेव के तपस्वी जीवन, राष्ट्रनिष्ठ विचारधारा तथा समाजोत्थान में उनके अनुपम योगदान पर विचार व्यक्त किए।
मुख्यमंत्री, उत्तराखंड़ पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरि ने सदैव समाज को आगे बढ़ाने का कार्य किया है। उन्होंने भव्य बद्री एवं दिव्य बद्री के दर्शन का आह्वान किया। गंगा कॉरिडोर के निर्माण की जानकारी दी तथा शारदा कॉरिडोर के विकास का भी आह्वान किया।
उन्होंने देहरादून स्थित हिन्दू स्टडी सेंटर के विषय में जानकारी देते हुए कहा कि वहाँ युवा पीढ़ी आकर शोध कार्य करेगी। समान नागरिक संहिता, सबके लिए शिक्षा तथा मदरसा बोर्ड को बंद करने के निर्णय की जानकारी भी प्रदान की। साथ ही बताया कि जुलाई 2026 से मदरसों में उत्तराखण्ड बोर्ड का ही पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा।
उन्होंने कहा कि देवभूमि के देवत्व को बनाए रखने के लिए हमारी सरकार समर्पित है। 12 हजार एकड़ भूमि को लैंड जिहाद से मुक्त कराने का कार्य किया गया है। सख्त धर्मांतरण कानून लाने तथा लैंड जिहाद और लव जिहाद से मुक्त उत्तराखण्ड की दिशा में सरकार संकल्पित है। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि संन्यास संसार से पलायन नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि को अपना परिवार मानकर सेवा करने का महान संकल्प है। स्वामी केम जीवन में करुणा, समता,आध्यात्मिक अनुशासन और राष्ट्रभक्ति का अद्भुत समन्वय है।
71 वर्षों का यह संन्यास जीवन तप की तेजस्विता, त्याग की गरिमा और सेवा की साधना का अनुपम इतिहास है। पूज्य स्वामी जी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का दिव्य स्रोत है। संन्यास बाह्य परिधान का विषय नहीं, अपितु अंतःकरण की परिपक्वता का नाम है। सनातन दर्शन कहता है जब चित्त विषयासक्ति से निवृत्त होकर ब्रह्मतत्त्व में प्रवृत्त हो, तभी संन्यास का उदय होता है।
मुण्डकोपनिषद् कहता है “परिक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निर्वेदमायात्”। संसार का त्याग नहीं, संसार की अनित्यता का बोध ही तो सन्यास है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने कहा है संन्यास निष्क्रियता नहीं, अनासक्ति है। योगऋषि रामदेव ने कहा कि जिस दिन अभेद दृष्टि हमारे अंतःकरण में जागृत हो जाएगी, उसी दिन विभाजन की दीवारें स्वतः ढह जाएँगी। जब हम जाति, पंथ, भाषा, प्रांत, मत और उपासना-पद्धतियों के भेद से ऊपर उठकर एक ही सनातन चेतना को पहचानेंगे, तब वास्तविक एकता का सूर्योदय होगा। सनातन का मूल स्वर ही अभेद है “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति”, सत्य एक है। स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने महामण्डलेश्वर आचार्य प्रवर अनन्त विभूषित युगपुरुष स्वामी परमानन्द गिरि को रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर उनका अभिनन्दन किया।












