अग्नि-6 को हरी झंडी मिलते ही शुरू होगा निर्माण कार्य
नई दिल्ली। बदलते वैश्विक युद्ध परिदृश्य और अत्याधुनिक हथियारों की दौड़ के बीच भारत ने हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक के विकास में तेजी ला दी है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) प्रमुख समीर वी. कामत ने संकेत दिया है कि देश जल्द ही ‘हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल’ और ‘हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल’ जैसी अत्याधुनिक क्षमताओं से लैस होगा। यह तकनीक भारत की सामरिक ताकत को नई ऊंचाई देने वाली मानी जा रही है।
डीआरडीओ प्रमुख के अनुसार, इन मिसाइलों की रफ्तार वर्तमान सुपरसोनिक ब्रह्मोस मिसाइल से लगभग दोगुनी होगी। हाइपरसोनिक मिसाइलें ध्वनि की गति से पांच गुना (मैक 5) या उससे अधिक रफ्तार से उड़ान भरती हैं, जिससे उन्हें ट्रैक करना और रोकना बेहद कठिन हो जाता है। कामत ने कहा कि हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल का पहला परीक्षण जल्द संभव है, जो भारत के लिए एक अहम मील का पत्थर होगा।
हाइपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल की खासियत यह है कि इसे रॉकेट बूस्टर के जरिए अंतरिक्ष की सीमा तक ले जाया जाता है, जहां से यह अलग होकर बिना इंजन के ग्लाइड करते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ती है। इसकी सबसे बड़ी ताकत इसका मार्ग बदलने की क्षमता है, जिससे यह पारंपरिक डिफेंस सिस्टम को चकमा दे सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यही वजह है कि दुनिया के मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम इन मिसाइलों को रोकने में लगभग असफल माने जाते हैं।
वहीं, हाइपरसोनिक क्रूज मिसाइल स्क्रैमजेट इंजन तकनीक पर आधारित होती है। यह इंजन हवा में मौजूद आॅक्सीजन का इस्तेमाल ईंधन जलाने के लिए करता है, जिससे मिसाइल हल्की और बेहद तेज हो जाती है। डीआरडीओ ने हाल ही में स्क्रैमजेट प्रोपल्शन का 1,000 सेकंड से अधिक समय तक सफल परीक्षण किया है, जिसे बड़ी तकनीकी उपलब्धि माना जा रहा है। कामत ने बताया कि औपचारिक मंजूरी मिलने के बाद अगले पांच वर्षों में इस प्रणाली को सेना में शामिल करने का लक्ष्य रखा गया है।
भारत न केवल हाइपरसोनिक तकनीक पर काम कर रहा है, बल्कि एक नई पीढ़ी की एंटी-शिप मिसाइल भी विकसित कर रहा है, जो ब्रह्मोस से भी अधिक तेज होगी। इस परियोजना के तीसरे चरण का परीक्षण इसी महीने प्रस्तावित है। इससे भारतीय नौसेना की मारक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।वैश्विक स्तर पर देखें तो रूस और चीन इस तकनीक में पहले ही बढ़त बना चुके हैं। रूस के पास ‘जिरकॉन’ और ‘किंजल’ जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं, जबकि चीन ‘डीएफ-जेडएफ’ प्रणाली को तैनात कर चुका है। अमेरिका ने भी इस दिशा में प्रयास किए हैं, लेकिन उसके कुछ प्रोजेक्ट अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाए हैं।
इसी बीच डीआरडीओ प्रमुख ने अगली पीढ़ी की इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल ‘अग्नि-6’ को लेकर भी बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के लिए तकनीकी तैयारी पूरी हो चुकी है और सरकार की मंजूरी मिलते ही इस पर काम शुरू कर दिया जाएगा। माना जा रहा है कि अग्नि-6 की मारक क्षमता 10,000 से 12,000 किलोमीटर तक हो सकती है और यह एक साथ कई परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम होगी।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि हाइपरसोनिक और लंबी दूरी की मिसाइलों के विकास से भारत की सामरिक क्षमता में गुणात्मक वृद्धि होगी। यह न केवल दुश्मनों के लिए एक मजबूत प्रतिरोधक (डिटरेंस) साबित होगी, बल्कि वैश्विक रक्षा संतुलन में भी भारत की स्थिति को और मजबूत करेगी।












