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चकलवंशी के रसगुल्ले की पहचान, बक्सर की गुजिया का जलवा, बनी प्रदेश की शान

उन्नाव। उन्नाव जिले की दो पारंपरिक मिठाइयां चकलवंशी का देसी रसगुल्ला और बक्सर की गुजिया अपनी विशिष्ट पहचान और स्वाद के कारण चर्चा का विषय बनी हुई हैं। वर्षों से चली आ रही यह मिठास न केवल जिले की पहचान है, बल्कि आसपास के जनपदों और प्रदेशों तक अपनी अलग छाप छोड़ रही है।

मिट्टी की सौंधी खुशबू वाला चकलवंशी का रसगुल्ला
चकलवंशी में तैयार होने वाला देसी रसगुल्ला अब केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है। इसकी खासियत इसका गाढ़ा रस और मिट्टी की सौंधी महक है, जो इसे सामान्य रसगुल्लों से अलग बनाती है। लगभग 100 वर्षों से यह रसगुल्ला लोगों को अपने स्वाद का दीवाना बनाए हुए है।

दुकानदारों के अनुसार, हरदोई रोड से गुजरने वाले लोग यहां रुककर इस रसगुल्ले का स्वाद जरूर चखते हैं। इसकी एक और विशेषता यह है कि रसगुल्लों को मिट्टी की मटकी में पैक किया जाता है, जिससे मिठास के साथ-साथ उसकी प्राकृतिक सुगंध भी बनी रहती है। वर्तमान में यह रसगुल्ला 18 रुपये प्रति पीस तथा लगभग 360 रुपए प्रति किलो की दर से बिक रहा है।

घाटमपुर का अथपेपा भी बना आकर्षण का केंद्र
घाटमपुर का प्रसिद्ध अथपेपा भी लोगों की पसंदीदा मिठाइयों में शामिल है। लखनऊ, फतेहपुर, कानपुर समेत कई जिलों से लोग इसे खरीदने पहुंचते हैं। खोया से तैयार की जाने वाली यह मिठाई मिल्क केक जैसी होती है। जिसने भी इसका स्वाद चखा, वह इसका प्रशंसक बन गया। बताया जाता है कि वर्ष 1960 के दशक से यह मिठाई लोगों को आकर्षित कर रही है।

बीघापुर का संगम पेड़ा आगरा तक मशहूर
बीघापुर चौराहे पर स्थित संगम पेड़ा भी अब जिले की सीमाओं को पार कर अपनी पहचान बना चुका है। दुकान संचालक अजय ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय राधाकृष्ण साहू ने वर्ष 1991 में पेड़ा बनाना शुरू किया था। आज यह पेड़ा आगरा तक अपनी प्रसिद्धि के लिए जाना जाता है। प्रयागराज, रायबरेली और लखनऊ जैसे शहरों से भी लोग यहां पेड़ा खरीदने आते हैं। बक्सर की गुजिया का स्वाद आज भी बरकरार बक्सर की पारंपरिक गुजिया भी लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। करीब 100 वर्ष पुरानी इस मिठाई का इतिहास स्थानीय आस्था और परंपराओं से जुड़ा है।

बक्सर के मां चंडिका मंदिर के पास बिकने वाली यह गुजिया माता को चढ़ाए जाने वाले भोग-प्रसाद के रूप में भी प्रसिद्ध है। स्थानीय लोगों के अनुसार, इस दुकान का संबंध स्वतंत्रता संग्राम के दौर से जुड़ा रहा है और इसे ‘बिल्ला सेठ’ के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में दुकान का संचालन सोनू और मेनू संभाल रहे हैं। यहां की गुजिया इतनी लोकप्रिय है कि बक्सर ही नहीं, आसपास के कई जनपदों में भी इसकी मांग बनी रहती है। यह गुजिया लगभग 360 से लेकर 380 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रही है।

देश में मिठाइयों का सांस्कृतिक महत्व
भारत में मिठाइयां केवल भोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि संस्कृति और परंपरा का प्रतीक हैं। जन्मदिन, विवाह, त्योहार और अन्य शुभ अवसरों पर मिठाई बांटना शुभ माना जाता है। अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों की अपनी विशिष्ट मिठाइयां हैं, जो वहां की स्थानीय परंपराओं और खानपान की पहचान को दशार्ती हैं। यही कारण है कि भारतीय उत्सव और मिठाइयां एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं।

स्थानीय स्वाद को मिल रही राष्ट्रीय पहचान
चकलवंशी का रसगुल्ला, घाटमपुर का अथपेपा, बीघापुर का संगम पेड़ा और बक्सर की गुजिया जैसी पारंपरिक मिठाइयां यह साबित करती हैं कि स्वाद और गुणवत्ता के दम पर स्थानीय उत्पाद भी राष्ट्रीय पहचान हासिल कर सकते हैं।

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