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आज के दौर में जब देश का बड़ा हिस्सा अब भी पारंपरिक खेती पर निर्भर है, तो वहीं बस्ती जिले का एक युवा किसान जिसने पारंपरिक खेती को छोड़कर आधुनिक तकनीकों को अपनाकर खेती को लाभकारी व्यवसाय बनाया है। उन्होने अपने खेत में पॉलीहाउस स्थापित किया जिसके बाद सरकार के तरफ से 29 लाख रुपए का सरकारी अनुदान भी मिला है। हर महीने 80 हजार रुपए की लागत लगाकर जरबेरा (फूल) की खेती करके 4 लाख रुपए से ज्यादा की कमाई कर रहा है। जरबेरा के फूल आकर्षक होते हैं और इनको ज्यादा समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इनका उपयोग शादी समारोहों में व्यापक रूप से किया जाता है। औषधीय गुण की बात करें तो इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट और फ्लेवोनॉयड्स, स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं। इसके अलावा जरबेरा के रंग-बिरंगे फूल मानसिक तनाव कम करने, मन को प्रसन्न रखने और शुद्ध वातावरण बनाने में सहायक माने जाते हैं। इस फूल की मांग ज्यादा होने के कारण इनका बाजार में भाव भी अधिक है। इसलिए यूपी सहित पूरे भारत में जरबेरा की खेती दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। किसान की इस सफलता ने यह साबित कर दिया है कि यदि खेती में नई सोच और तकनीक का समावेश किया जाए, तो बेहतर मुनाफा कमाया जा सकता है। आज वह न केवल जिले के किसानों, बल्कि बेरोजगार युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन चुके हैं और कई लोगों को आधुनिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। दो साल पहले की थी शुरूआत, 29 लाख का सरकारी अनुदान मिला कप्तानगंज विकासखंड के दुबौली मिश्र गांव निवासी विजयशंकर वर्मा (43) ने बताया कि मेरे पिता (मनिराम वर्मा) चाहते थे की मैं सरकारी नौकरी की तैयारी करूं, लेकिन मैंने खेती किसानी को सबसे अच्छा माना, और खेती किसानी करने लगा। आज से दो साल पहले मेरा छोटा भाई रविशंकर वर्मा जो एयरफोर्स कार्यरत है। पंजाब में तैनाती के दौरान वहां बड़े स्तर पर हो रही आधुनिक फूलों की खेती देखी। भाई छूट्टी पर घर आया तो एक दिन कहा- भईया आप जरबेरा की खेती करिए बहुत प्रॉफिट होगा। जिसके बाद खेती करने के बारे में हमने मन बनाया और शुरू कर दी। इस आधुनिक खेती के तहत सरकार से एक 29 लाख रुपए का अनुदान प्राप्त हुआ, जिससे अत्याधुनिक पॉलीहाउस लगाया गया। इस समय पॉलीहाउस में लाल, सफेद, गुलाबी और नारंगी रंगों के जरबेरा फूलों का शानदार उत्पाद हो रहा है। जरबेरा फूल लगाने का आसान तरीका विजयशंकर वर्मा ने बताया कि जरबेरा की खेती करने का यानि पौधे को लगाने का सही समय सितंबर से जून या फरवरी से मार्च तक होता है। उन्होने आगे बताया कि सबसे पहले स्थानीय नर्सरी से या फिर कृषि विज्ञान केंद्र से अपने आवश्यक्ता अनुसार स्वास्थ्य पौधों को मंगा लें। रोपाई के तीन महीने बाद फूल देना शुरू, लागत 80 हजार रुपए वर्मा ने बताया कि जरबेरा के पौधे रोपाई के लगभग तीन माह बाद फूल देना शुरू हो जाते हैं और एक बार लगाने के बाद करीब पांच बर्षों तक उत्पाद देते हैं। गर्मियों में पौधे को ड्रिप सिंचाई के माध्यम से हर तीन दिन पर पानी दिया जाता है, जबकि सर्दियों में खाद के साथ दिए गए पानी से ही सिंचाई की आवश्यता पूरी हो जाती है। पौधे को रोगो से सुरक्षित रखने के लिए हर तीसरे दिन कीटनाशक का छिड़काव और पोषण पर प्रतिमाह लगभग 80 हजार रुपए खर्च आते है। आगे उन्होंने बताया कि बेहतर उत्पाद और बाजर में अच्छी मांग के कारण यह खेती लाभदायक साबित हो रहा है। जरबेरा स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी माध्यम बन रहा इस पॉलीहाउस में स्थाई रूप से चार-पांच श्रमिक नियमित रूप से काम करते हैं। इसके अलावा फूलों की तुड़ाई, पैकिंग और अन्य कृषि कार्यों के दौरान समय-समय पर और मजदूरों को भी रोजगार मिलता रहता है। जिससे यह आधुनिक खेती बेहतर आय के साथ-साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार का भी माध्यम बन रहा है। जहां एक तरफ आज हमारे क्षेत्र के श्रमिक दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए जाते और वहां पर काम के लिए भटकते हैं। लेकिन इस तरह की खेती करने पर स्थानीय स्तर यानि की उनको अपने क्षेत्र में ही रोजगार मिल जा रहा है। वर्मा बताते हैं कि इस तरह की खेती हमारे अन्य किसानों को भी करनी चाहिए जिससे उनको अच्छी आय के साथ अन्य को भी रोजगार देने का मौका मिल सके। जरबेरा की अपूर्ति लखनऊ दिल्ली तक हो रही दैनिक भास्कर के रिपोर्टर से बात करते हुए वर्मा बताते हैं कि आज जरबेरा की आपूर्ति स्थानीय बजार के अलावा लखनऊ, कानपूर, अयोध्या, दिल्ली जैसे बड़े-बड़े शहरों तक हो रही है। उन्होने बताया कि खेत से फूल को तोड़ने के बाद स्थानीय फू्ल मंडी ले जाया जाता है, जहा से बाहर सप्लाई होती है। हालांकि स्थानीय स्तर पर संगठित बाजार की कमी के कारण व्यवसाय में कभी- कभी कठिनाईयों का सामाना करना पड़ता है। आगे वर्मा बताते हैं कि यदि हमारे किसान भाई वैज्ञानिक तकनीकों और आधुनिक खेती को अपनाएं तो कम भूमि में भी बेहतर आमदनी हासिल कर सकते हैं और स्थानीय श्रमिकों को रोजगार भी दे सकते हैं। जरबेरा का बड़े-बड़े कार्यक्रमों में सजावट के रूप में उपयोग जरबेरा एक आकर्षक और सुंदर फूल है, जिसका उपयोग बड़े कार्यक्रमों में विशेष रूप से किया जाता है। किसी मंत्री, जनप्रतिनिधि या विशिष्ट अतिथि के स्वागत के लिए दिए जाने वाले गुलदस्तों में जरबेरा फूल प्रमुख रूप से शामिल रहता है। सरकारी समारोह, सम्मान समारोह, उद्घाटन कार्यक्रम, सांस्कृतिक आयोजन और सार्वजनिक मंचों की सजावट में भी इसका व्यापक उपयोग होता है। शादी-विवाह, सगाई, रिसेप्शन, वर्षगांठ और अन्य पारिवारिक आयोजनों में जरबेरा फूलों से मंच, प्रवेश द्वार, मंडप और फोटो प्वाइंट को सजाया जाता है। इसके अलावा दूल्हा-दुल्हन के लिए तैयार किए जाने वाले सुंदर गुलदस्तों में भी इसका विशेष स्थान होता है। विभिन्न रंगों में उपलब्ध होने के कारण यह हर तरह की सजावट को आकर्षक और भव्य बना देता है। यही वजह है कि लगभग हर बड़े समारोह और विशेष अवसर पर जरबेरा फूल आसानी से देखने को मिल जाता है। खेती करने के लिए सरकारी अनुदान लेने का तरीका जब किसान से पूछा गया कि आपको जो सरकार के तरफ से 29 लाख रुपए का अनुदान मिला है, उसे लेने का प्रोसेस क्या है? उन्होने ने बताया कि केंद्र एवं राज्य सरकारें राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) और समेकित बागवानी विकास मिशन (MIDH) के तहत पॉलीहाउस निर्माण की लागत पर 50 प्रतिशत से 80 प्रतिशत तक सब्सिडी प्रदान करती हैं। हालांकि सब्सिडी की दर राज्य, योजना और पात्रता के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। उन्होने बताया कि इसे लेने लिए सबसे पहले संबंधित उद्यान विभाग में आवेदन किया जाता है। जरबेरा का औषधीय महत्व आयुर्वेदिक विशेषज्ञ डॉ. कमलेश (MD) ने बताया कि जरबेरा मुख्य रूप से एक सजावटी फूल है। यह दक्षिण अफ्रिका में उगाए जाने वाले फूलों में प्रमुख है, लेकिन आज के समय में हमारे भारत में भी बड़ी मात्रा में इसकी खेती किया जा रहा है। औषधीय गुण की बात करें तो इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट और फ्लेवोनॉयड्स, स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माने जाते हैं। ये कैंसर, कोलेस्ट्राल, घावों और कफ जैसे गंभीर रोगों में लाभदायक है। कुछ प्रारंभिक शोधों में यह संकेत मिले हैं कि ये तत्व शरीर की कोशिकाओं को मुक्त कणों (फ्री रेडिकल्स) से होने वाले नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इसके अलावा जरबेरा के रंग-बिरंगे फूल मानसिक तनाव कम करने, मन को प्रसन्न रखने और शुद्ध वातावरण बनाने में सहायक माने जाते हैं। इसी कारण अस्पतालों,स्वास्थ्य केंद्रों और घरों में सजावट के लिए इनका उपयोग किया जाता है। हालांकि, यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि वर्तमान में जरबेरा किसी मान्यता प्राप्त आयुर्वेदिक या एलोपैथिक औषधि के रूप में उपयोग नहीं किया जाता। इसलिए इसे औषधीय पौधे की बजाय एक आकर्षक और मानसिक सुकून देने वाले सजावटी फूल के रूप में ही अधिक जाना जाता है।
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जरबेरा की खेती से महीने में कमाए 4 लाख रुपए:बस्ती में पिता चाहते थे सरकारी नौकरी, बेटे ने मांगा खेत; कहा- कुछ अलग करना है
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