बहराइच के जरवल नगर में स्थित लगभग 300 वर्ष पुराने इमामबाड़े का पुनर्निर्माण कार्य पूरा हो गया है। यह इमामबाड़ा जरवल की धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक माना जाता है, जो समय के साथ जर्जर हो गया था। अब इसे फिर से उसी पारंपरिक अंदाज में संवारा गया है। प्रोफेसर सफी हैदर उर्फ आमिल मियां ने इस ऐतिहासिक इमामबाड़े के पुनर्निर्माण पर बात करते हुए बताया कि यह उनके पूर्वजों द्वारा दी गई एक अमूल्य धरोहर है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उनकी छह पीढ़ियों की यादों, धार्मिक परंपराओं और भावनाओं से जुड़ा हुआ स्थल है। प्रोफेसर सफी हैदर ने बताया कि लंबे समय से इमामबाड़े की स्थिति जर्जर हो गई थी। इसकी ऐतिहासिक महत्ता को देखते हुए इसे दोबारा संवारने का निर्णय लिया गया। पुनर्निर्माण के दौरान इसकी पुरानी पहचान, बनावट और पारंपरिक शैली को बनाए रखने पर विशेष ध्यान दिया गया, ताकि भावी पीढ़ियां भी इस विरासत से जुड़ी रह सकें। प्रोफेसर सफी हैदर के अनुसार, यह जरवल का सबसे पुराना और केंद्रीय इमामबाड़ा है, जहाँ वर्षों से धार्मिक कार्यक्रम और मजलिसें आयोजित होती रही हैं। वर्तमान में कामिल मियां और डेविल मियां इसकी देखरेख करते हैं, जो इसकी परंपराओं को आगे बढ़ाने का कार्य जिम्मेदारी से निभा रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि यह इमामबाड़ा सभी श्रद्धालुओं के लिए खुला है। कोई भी व्यक्ति यहाँ जियारत के लिए आ सकता है, जिस पर कोई पाबंदी नहीं है। यह स्थान प्रेम, आस्था और याद-ए-अहलेबैत से जुड़ा हुआ है। मुहर्रम के अवसर पर यहाँ से मजलिसों का सिलसिला शुरू होता है। हर साल 1 मुहर्रम से 10 मुहर्रम तक सुबह 8 बजे इसी इमामबाड़े में मजलिस का आयोजन होता है। इन मजलिसों को सैयद पुरनूर हैदर और मौलाना वसीम साहब संबोधित करते हैं, जिसके बाद क्षेत्र के अन्य इमामबाड़ों में भी मजलिसें आयोजित की जाती हैं। प्रोफेसर सफी हैदर ने कहा कि इस इमामबाड़े की पहचान और इतिहास में स्वर्गीय सैयद अली हैदर, स्वर्गीय अल्लाह मियां, मियां जैसी शख्सियतों का अहम योगदान रहा है। इन बुजुर्गों की मेहनत और देखरेख से यह विरासत आज भी कायम है।
जरवल के लोगों का कहना है कि 300 साल पुरानी इस धरोहर का पुनर्निर्माण सिर्फ एक इमारत की मरम्मत नहीं बल्कि अपनी तहजीब, इतिहास और धार्मिक विरासत को सुरक्षित रखने की एक बड़ी मिसाल है। यह इमामबाड़ा आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जरवल की पहचान और गौरव का प्रतीक बना रहेगा।
जरवल के 300 साल पुराने इमामबाड़े का जीर्णोद्धार:छह पीढ़ियों की आस्था का केंद्र, मुहर्रम की मजलिसें यहीं से शुरू
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