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मानसून सत्र: सर्वदलीय बैठक में एनसीपीआई को लेकर विपक्ष का सांकेतिक वॉकआउट

  • टीएमसी के 20 सांसदों के विलय पर अब तक नहीं लगी लोकसभा अध्यक्ष की मुहर

नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र से एक दिन पहले रविवार को आयोजित सर्वदलीय बैठक में नवगठित नेशनल सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) को आमंत्रित किए जाने को लेकर विपक्षी दलों ने सांकेतिक विरोध दर्ज कराया। तृणमूल कांग्रेस की आपत्ति के बाद कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, द्रविड़ मुनत्र कड़गम, झारखंड मुक्ति मोर्चा, आम आदमी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, वाम दलों और शिवसेना (यूबीटी) सहित कई विपक्षी दलों के नेताओं ने कुछ मिनट के लिए बैठक से वॉकआउट किया। बाद में सभी नेता लौटकर बैठक में शामिल हुए। इस बीच संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सभी दलों से संसद की कार्यवाही सुचारु रूप से चलाने में सहयोग करने की अपील की।

रविवार को संसद भवन एनेक्सी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में हुई बैठक में केंद्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा, किरेन रिजिजू, अर्जुन राम मेघवाल सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के फ्लोर लीडर और सांसद शामिल हुए। बैठक का उद्देश्य 20 जुलाई से शुरू होने वाले मानसून सत्र के दौरान विधायी कार्यों और सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए सभी दलों के बीच सहमति बनाना था।

बैठक की शुरुआत में ही तृणमूल कांग्रेस ने एनसीपीआई को आमंत्रित किए जाने पर कड़ा विरोध जताया। विपक्षी दलों का कहना था कि नवगठित पार्टी को अभी तक लोकसभा में आधिकारिक मान्यता नहीं मिली है और इस संबंध में अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष विचाराधीन है। विपक्ष ने इसे संसदीय परंपराओं के विपरीत बताते हुए कुछ मिनट के लिए बैठक का बहिष्कार किया और बाद में चर्चा में शामिल हो गया।

संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बैठक के बाद पत्रकारों से कहा कि सोमवार से शुरू हो रहे मानसून सत्र में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयक और अन्य विधायी कार्य सदन के समक्ष रखेगी। उन्होंने कहा कि संसद लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है और यहां प्रत्येक निर्वाचित प्रतिनिधि को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है। सरकार चाहती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों रचनात्मक भूमिका निभाएं ताकि सदन की कार्यवाही बिना किसी व्यवधान के संचालित हो सके।

रिजिजू ने कहा कि सरकार विपक्ष की ओर से उठाए जाने वाले हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है, लेकिन असहमति का समाधान हंगामे के बजाय बहस और संवाद के माध्यम से होना चाहिए। उन्होंने कहा कि संसद की कार्यवाही बाधित होने से जनता का समय और करदाताओं का पैसा दोनों व्यर्थ होता है। पिछले वर्षों में लगातार व्यवधान से सदन का काफी समय नष्ट हुआ, जबकि देश की जनता चाहती है कि संसद में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर सार्थक चर्चा हो।

कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर कहा कि सभी विपक्षी दलों ने कुछ मिनट के लिए बैठक का बहिष्कार किया। उनके अनुसार यह विरोध तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों के नए समूह एनसीपीआई को सर्वदलीय बैठक में आमंत्रित किए जाने के खिलाफ था, जबकि इस संबंध में अंतिम निर्णय अभी लोकसभा अध्यक्ष द्वारा लिया जाना बाकी है।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि लोकसभा सचिवालय के रिकॉर्ड में तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसद दर्ज हैं और पार्टी से अलग हुए 20 सांसदों के विलय को अभी तक लोकसभा अध्यक्ष की मंजूरी नहीं मिली है। उन्होंने कहा कि इन सांसदों से संबंधित अयोग्यता याचिकाएं भी लंबित हैं, इसलिए उन्हें अलग राजनीतिक दल के रूप में बैठक में बुलाना उचित नहीं था।

समाजवादी पार्टी के सांसद धर्मेंद्र यादव ने सरकार की प्रक्रिया को लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं बताया। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सांसद पी. संतोष कुमार ने आरोप लगाया कि सरकार राजनीतिक दलों में टूट को बढ़ावा दे रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं है। आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सदस्य एन.डी. गुप्ता ने भी विपक्ष के विरोध का समर्थन करते हुए कहा कि उनके दल से जुड़े मामलों में भी याचिकाएं लंबित हैं, लेकिन अलग व्यवस्था अपनाई गई है। वहीं, शिवसेना (यूबीटी) के सांसद अरविंद सावंत ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से प्रयुक्त ‘एफिलिएशन’ शब्द का कानून में कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।

दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर एनसीपीआई में शामिल सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया कि 20 सांसदों का उनकी पार्टी में विलय हो चुका है और लोकसभा अध्यक्ष ने उन्हें अलग समूह के रूप में बैठने की व्यवस्था करने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी संसद में राष्ट्रहित और विकास के मुद्दों पर सकारात्मक भूमिका निभाएगी।

एनसीपीआई के नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा कि वह नई पार्टी के नेता के रूप में सर्वदलीय बैठक में शामिल हुए हैं। उन्होंने कहा कि संसद सरकार और विपक्ष दोनों की है तथा लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए सरकार को विपक्ष के प्रति सहिष्णुता का परिचय देना चाहिए। साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी धर्मनिरपेक्ष मूल्यों में विश्वास रखती है और संसद में रचनात्मक सहयोग की भूमिका निभाएगी।

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