अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस डे पर विशेष
लखनऊ। हर साल 12 मई को अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस दिवस मनाया जाता है। यह दिन उन नर्सों को समर्पित है,जो अपने त्याग, समर्पण और सेवा भाव से अनगिनत जिंदगियों को नई शुरुआत देती हैं। इन्हीं समर्पित चेहरों में एक नाम रीता वर्मा का भी है, जो पिछले लगभग 18 वर्षों से नवजात और मातृ स्वास्थ्य सेवाओं में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। उनके लिए नर्सिंग केवल एक पेशा नहीं, बल्कि हर नवजात की पहली सांस को सुरक्षित करने की जिम्मेदारी है।
“मैं हूँ रीता वर्मा… और हर नवजात की पहली सांस मेरे लिए एक जिम्मेदारी है।” “मैं पिछले 12 वर्षों से एसजीपीजीआई में नर्सिंग ऑफिसर के रूप में कार्यरत हूं। लेबर रूम और वार्ड मेरे लिए सिर्फ कार्यस्थल नहीं, बल्कि ऐसी जगह हैं जहां हर जन्म अपने साथ एक जिम्मेदारी लेकर आता है—जहां एक पल की सतर्कता एक पूरी जिंदगी को बचा सकती है।”
रीता आज भी अपने करियर के उन पलों को नहीं भूल पातीं, जिन्होंने उन्हें नर्सिंग की असली संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का एहसास कराया। वह बताती हैं, “मुझे आज भी वह दिन याद है, जब एक प्रीमैच्योर बच्चे का जन्म हुआ, लेकिन वह रोया नहीं। उस पल जैसे समय ठहर गया था। हम इसे ‘गोल्डन मिनट’ कहते हैं—जन्म के बाद का पहला मिनट, जो नवजात के जीवन की दिशा तय करता है। बच्चा मेरी गोद में था। मैंने तुरंत सक्शन किया, हल्का स्टिमुलेशन दिया और कुछ ही सेकंड में उसकी पहली रोने की आवाज सुनाई दी।वह रोना सिर्फ एक आवाज नहीं था, बल्कि एक नई जिंदगी की शुरुआत थी। उस पल जो सुकून मिला, उसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।”एक और घटना का जिक्र करते हुए रीता कहती हैं, “ एक माँ ने बच्चे को स्तनपान कराया, लेकिन फीड के बाद डकार नहीं दिलाई। कुछ समय बाद जब बच्चे को उठाया गया, तो उसकी गतिविधियां कम थीं। मुझे तुरंत स्थिति गंभीर लगी और मैं बिना देर किए उसे एनआईसीयू लेकर गई। जांच में पता चला कि दूध सांस की नली में चला गया था। डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया और बच्चा सुरक्षित बच गया। उस दिन मैंने फिर महसूस किया कि नवजात की देखभाल में छोटी-सी लापरवाही भी बड़ी बन सकती है।”रीता बताती हैं कि नियमित प्रशिक्षण और प्रोटोकॉल के पालन से ऐसी आपात परिस्थितियों में तुरंत और सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।वह कहती हैं, “प्रशिक्षण ने मेरे भीतर आत्मविश्वास पैदा किया। सैद्धांतिक प्रशिक्षण मेरी नींव था, लेकिन एनआईसीयू की पहली रात की ड्यूटी ने मुझे सिखाया कि वास्तविक नर्सिंग किताबों से कहीं आगे होती है। इसी अनुभव ने संकट की स्थिति में सही निर्णय लेने और साहस के साथ जिम्मेदारी निभाने का आत्मबल दिया।”
रीता मानती हैं कि उन्हें सबसे बड़ा मार्गदर्शन अपनी मां और वरिष्ठजनों से मिला। उनके अनुसार, वरिष्ठों ने केवल तकनीकी कौशल ही नहीं सिखाए, बल्कि यह भी समझाया कि अस्पताल में मरीज और उनके परिजन स्वयं को सुरक्षित और भरोसेमंद महसूस करें। वह कहती हैं, “एडवांस नर्सिंग केवल वेंटिलेटर चलाने तक सीमित नहीं है, बल्कि माँ और उसके परिवार की काउंसलिंग करना, उन्हें हिम्मत देना और पूरी टीम को साथ लेकर चलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।”
रीता के अनुसार, सिस्टम और विशेषज्ञों के सहयोग ने उनकी क्लिनिकल सोच और टीमवर्क क्षमता को मजबूत किया। विशेषज्ञों ने उन्हें केस डिस्कशन में शामिल किया, प्रोटोकॉल समझाए और निर्णय लेने की प्रक्रिया से परिचित कराया।
“प्रशिक्षण ने मुझे कौशल दिया, मार्गदर्शन ने दिशा दी और सिस्टम ने आगे बढ़ने का मंच प्रदान किया,” वह मुस्कुराते हुए कहती हैं। नवजात देखभाल की चुनौतियों पर बात करते हुए रीता कहती हैं, “नवजात अपनी तकलीफ बता नहीं सकता। उसकी हर सांस, हर हलचल को समझना पड़ता है। यही हमारी सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी।”
वह आगे जोड़ती हैं, “हमारा काम सिर्फ इलाज करना नहीं है। हम माँ के साथ मिलकर बच्चे की हर जरूरत को समझते हैं—खासकर तब, जब माँ खुद दर्द में होती है, जैसे सीजेरियन के बाद।”
रीता नवजात के शुरुआती देखभाल के महत्व पर विशेष जोर देती हैं। उनके अनुसार, “जन्म के तुरंत बाद माँ और बच्चे का स्किन-टू-स्किन संपर्क और केवल स्तनपान बेहद जरूरी है। यही बच्चे को गर्माहट, सुरक्षा और जीवन की सबसे मजबूत शुरुआत देता है।”
माताओं के लिए संदेश
“ जन्म के बाद बच्चे को केवल मां का दूध दें—यही उसका पहला सुरक्षा कवच है। हर फीड के बाद डकार जरूर दिलाएं और उसकी हर छोटी गतिविधि पर ध्यान रखें। आपकी सतर्कता ही उसके स्वस्थ भविष्य की नींव है।”
“ हर पहली सांस को सुरक्षित करना—यही मेरी पहचान है। ” रीता बताती हैं कि उन्होंने वर्ष 2008 में इस पेशे को चुना। एसजीपीजीआई से पहले वह किंंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में कार्यरत थीं।
“बचपन में अस्पताल में डॉक्टरों और नर्सों को देखकर ही इस पेशे के प्रति आकर्षण हुआ। सेवा भाव मुझे अपने पिता से मिला, जिनका मानना है कि असहाय और बीमारों की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है।”
वह कहती हैं, “आज भी जब कोई नवजात स्वस्थ होकर अपनी माँ की गोद में जाता है, वही मेरे लिए सबसे बड़ा इनाम होता है।”
मरीजों के लिए अतिरिक्त पहल
रीता बताती हैं कि प्रसूति वार्ड में मरीजों के लिए लाइब्रेरी की व्यवस्था की गई है, जिसकी जिम्मेदारी वह स्वयं संभालती हैं। यहाँ भर्ती महिलाएं किताबें पढ़कर अपना समय सकारात्मक और सार्थक ढंग से व्यतीत कर सकती हैं।
इसके साथ ही सुबह के समय महिला मरीजों के लिए नियमित योग सत्र भी आयोजित किए जाते हैं, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में सहायक हैं।
मिला सम्मान
रीता वर्मा को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए वर्ष 2024 में प्रसूति विभाग द्वारा ‘बेस्ट नर्सिंग ऑफिसर अवॉर्ड’ से सम्मानित किया जा चुका है।












