- एनएफआईआर बोला-18 हजार में गुजारा नामुमकिन, 69 हजार ही न्यूनतम हक
- 5 लाख पद घटे, काम बढ़ा-रेलवे में ‘ओवरलोड सिस्टम’ का खतरा
नई दिल्ली। आठवें वेतन आयोग के औपचारिक गठन से पहले ही रेलवे कर्मचारियों का असंतोष खुलकर सामने आ गया है। नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन रेलवे में (एनएफआईआर) ने न्यूनतम वेतन को सीधे 18 हजार रुपये से बढ़ाकर 69 हजार रुपये करने की मांग रखते हुए इसे ‘जीवन की बुनियादी जरूरतों’ से जोड़ दिया है। इस मांग ने सरकार के सामने न सिर्फ आर्थिक, बल्कि प्रशासनिक चुनौती भी खड़ी कर दी है।
एनएफआईआर के महासचिव डॉ. एम. रघुवैया का कहना है कि मौजूदा वेतन संरचना अब पूरी तरह अप्रासंगिक हो चुकी है। उनका तर्क है कि डीए जोड़ने के बाद भी कर्मचारी की वास्तविक आय करीब 30 हजार रुपये के आसपास ही सिमट जाती है, जो आज के दौर में एक परिवार के लिए बेहद अपर्याप्त है। उन्होंने इसे ‘वास्तविकता से कटा हुआ वेतन ढांचा’ बताते हुए कहा कि अब वेतन निर्धारण महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
यह मांग सिर्फ वेतन बढ़ोतरी तक सीमित नहीं है। यूनियन ने ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) की बहाली को भी उतनी ही प्राथमिकता दी है। कर्मचारियों का मानना है कि नई पेंशन प्रणाली उन्हें रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा नहीं देती, जिससे भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। ऐसे में वेतन और पेंशन-दोनों मोर्चों पर दबाव बढ़ता दिख रहा है। इस पूरे विवाद के केंद्र में रेलवे का घटता कार्यबल भी है। एनएफआईआर के आंकड़ों के मुताबिक, एक समय 17 लाख से अधिक कर्मचारियों वाला रेलवे अब करीब 12.3 लाख कर्मचारियों पर आ गया है। दूसरी ओर, रेलवे नेटवर्क और ट्रेनों की संख्या लगातार बढ़ी है। यानी कम लोगों के भरोसे ज्यादा कार्म-यह असंतुलन अब खुलकर सामने आ चुका है।
विशेषज्ञ इसे ‘सिस्टमेटिक स्ट्रेस’ की स्थिति बता रहे हैं। उनका मानना है कि लगातार बढ़ता कार्यभार न केवल कर्मचारियों की उत्पादकता को प्रभावित करता है, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी जोखिम पैदा कर सकता है। थकान, लंबी ड्यूटी और संसाधनों की कमी-ये सभी कारक मिलकर रेलवे संचालन पर असर डाल सकते हैं।
रेलवे कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वे हर परिस्थिति-दिन, रात, त्योहार या आपात स्थिति में सेवाएं देते हैं, लेकिन उनके वेतन और सुविधाएं उनके योगदान के अनुरूप नहीं हैं। यही वजह है कि अब वेतन, पेंशन और भर्ती को एक व्यापक सुधार पैकेज के रूप में देखा जा रहा है।सरकार के लिए यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि इसका असर सिर्फ रेलवे तक सीमित नहीं रहेगा। यदि आठवें वेतन आयोग में न्यूनतम वेतन में बड़ा इजाफा होता है, तो इसका प्रभाव अन्य केंद्रीय कर्मचारियों और पूरे वित्तीय ढांचे पर पड़ेगा।
फिलहाल सरकार की ओर से कोई आधिकारिक रुख सामने नहीं आया है, लेकिन संकेत साफ हैं कि आठवां वेतन आयोग सिर्फ वेतन संशोधन नहीं, बल्कि कर्मचारियों की अपेक्षाओं और सरकार की वित्तीय प्राथमिकताओं के बीच संतुलन की बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है।












