सिद्धार्थनगर के सोहना स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि प्रसार वैज्ञानिक डॉ. शेष नारायण सिंह ने किसानों को हरी खाद के प्रयोग की सलाह दी है। उन्होंने रविवार को एक प्रेस विज्ञप्ति में बताया कि हरी खाद के उपयोग से मृदा और मानव स्वास्थ्य बेहतर होता है, साथ ही कृषि उत्पादन में वृद्धि होती है और पर्यावरण में सुधार आता है। इससे किसानों की उत्पादन लागत में भी कमी आती है। डॉ. सिंह के अनुसार, हरी खाद खेत के लिए संजीवनी बूटी का काम करती है। मई और जून के महीने में ढैचा और सनई जैसी हरी खाद की बुवाई की जाती है। इन फसलों को लगाने से अगली फसल के लिए खेत को प्राकृतिक रूप से खाद मिल जाती है। ढैचा एक दलहनी फसल है, जिसकी जड़ों में राइजोबियम नामक जीवाणु होता है। यह जीवाणु मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाता है। ढैचा को सभी प्रकार की जलवायु और मिट्टी में आसानी से उगाया जा सकता है। यह फसल एक सप्ताह तक 60 सेंटीमीटर जलभराव और अंकुरण के बाद सूखे को भी सहन कर सकती है। यह क्षारीय और लवणीय मृदाओं में भी अच्छी तरह पैदा होती है। बुवाई के 45 से 50 दिनों में यह 20 से 25 टन हरी खाद प्रदान करती है, जिससे लगभग 85 से 120 किलोग्राम नाइट्रोजन मिलता है। धान की रोपाई से पहले ढैचा को खेत में पलटने से खरपतवार भी नष्ट हो जाते हैं। वहीं, सनई अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी के लिए सबसे उपयुक्त हरी खाद की फसल है। यह भी खरपतवारों को नष्ट करने में सहायक होती है। बुवाई के 45 से 50 दिन बाद इसे खेत में पलट दिया जाता है। एक हेक्टेयर में सनई की फसल से लगभग 20 से 30 टन तक हरी खाद प्राप्त होती है। ढैचा की उन्नतशील किस्मों में नरेंद्र ढैचा एक और पंत ढैचा एक प्रमुख हैं। सनई की मुख्य किस्में अंकुर, स्वास्तिक और शैलेश हैं।
हरी खाद से मृदा और मानव स्वास्थ्य बेहतर:सोहना में कृषि वैज्ञानिक बोले, उत्पादन बढ़ेगा, लागत घटेगी
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