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लखनऊ। अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस दिवस पूर्व संध्या को लेकर वीरांगना अवंतीबाई जिला महिला अस्पताल की नर्सों और चिकित्सकों ने मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सेवाओं में नर्सिंग स्टाफ की अहम भूमिका को देखा गया । अस्पताल में कार्यरत नर्सें केवल चिकित्सा प्रक्रिया का हिस्सा नहीं, बल्कि माँ और नवजात की सुरक्षित जिंदगी की मजबूत आधारशिला हैं।
अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सलमान कहते हैं, “डॉक्टर और नर्स मिलकर हर उस बच्चे की जिंदगी बचाने का प्रयास करते हैं, जिसमें धड़कन है। नर्सें हमारी आँख, हाथ और सबसे बड़ा सहारा हैं। उनके बिना उपचार की कल्पना अधूरी है।” गर्भावस्था के पंजीकरण से लेकर प्रसव पूर्व जांच, सुरक्षित प्रसव, नवजात की शुरुआती देखभाल, स्तनपान में सहयोग, एसएनसीयू और केएमसी वार्ड में निगरानी, संक्रमण से बचाव और परिवार की काउंसलिंग तक—नर्सें हर चरण में सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
“ जन्म के बाद हर सेकंड महत्वपूर्ण होता है ”
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लेबर रूम की नर्सिंग ऑफिसर सुनीता पॉल बताती हैं कि बच्चे का जन्म केवल एक चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं, बल्कि उम्मीद और जिम्मेदारी से भरा संवेदनशील पल होता है।वह कहती हैं, “प्रसव से पहले ही हम पूरी तैयारी कर लेते हैं। लेबर रूम का तापमान, उपकरणों का स्टरलाइजेशन, नवजात के लिए गर्म कपड़े और जरूरत पड़ने पर वार्मर पहले से तैयार रखा जाता है, ताकि जन्म के तुरंत बाद बच्चे को सुरक्षित गर्माहट मिल सके।”सुनीता बताती हैं कि यदि बच्चा स्वस्थ जन्म लेता है, तो लगभग एक मिनट बाद नाल काटकर उसे मां के सीने से लगाया जाता है और स्तनपान शुरू कराया जाता है। इससे बच्चे को अतिरिक्त रक्त मिलता है और एनीमिया का खतरा कम होता है। वहीं यदि नवजात को कोई चिकित्सीय समस्या हो, तो तत्काल प्राथमिक देखभाल देकर उसे एसएनसीयू भेजा जाता है।
एसएनसीयू में निरंतर निगरानी और देखभाल
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एसएनसीयू में कार्यरत नर्सिंग ऑफिसर आभा बताती हैं कि नवजात के आने के बाद हर मिनट बेहद अहम होता है।“सबसे पहले बच्चे का शुगर लेवल, ऑक्सीजन स्तर और अन्य जरूरी पैरामीटर जांचे जाते हैं। डॉक्टरों के उपचार के साथ-साथ नर्सें लगातार बच्चे की निगरानी करती हैं। इस दौरान केवल बच्चे ही नहीं, बल्कि माँ और पूरे परिवार को भी मानसिक और व्यवहारिक सहयोग दिया जाता है,” वह कहती हैं।
कंगारू मदर केयर से मिलती है जीवन को मजबूती
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नर्सिंग अधिकारी सोनी बताती हैं कि समय से पहले जन्मे या कम वजन वाले बच्चों के लिए कंगारू मदर केयर (केएमसी) जीवनरक्षक साबित होती है। “हम माताओं और परिवार को समझाते हैं कि बच्चे को दिन में कम से कम 16 घंटे तक केएमसी मिलनी चाहिए। एक बार में कम से कम दो घंटे तक बच्चे को सीने से लगाकर रखना जरूरी होता है। 14 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी स्वस्थ सदस्य यह देखभाल दे सकता है,” वह बताती हैं।
संक्रमण से बचाव पर विशेष जोर
नर्सिंग अधिकारी नमिता के अनुसार, नवजात के लिए संक्रमण सबसे बड़ा खतरा होता है। इसलिए साफ-सफाई और हाथ धोने की आदतों पर विशेष ध्यान दिया जाता है।वह कहती हैं, “हम परिवार को बताते हैं कि बच्चे को छूने से पहले और बाद में साबुन से हाथ धोना जरूरी है। नाखून कटे होने चाहिए और हाथों में अंगूठी, चूड़ी या अन्य आभूषण नहीं होने चाहिए। ये छोटी सावधानियाँ नवजात को बड़े संक्रमण से बचाती हैं।”
माँ की देखभाल भी उतनी ही जरूरी

पोस्टनेटल वार्ड की नर्सिंग अधिकारी आसमा कहती हैं कि प्रसव के बाद परिवार का पूरा ध्यान अक्सर बच्चे पर केंद्रित हो जाता है, जबकि माँ का स्वास्थ्य भी उतना ही महत्वपूर्ण है। “ हम लगातार परिवार को समझाते हैं कि छह माह तक केवल स्तनपान कराने के लिए माँ का स्वस्थ रहना जरूरी है। इसलिए पौष्टिक आहार, पर्याप्त आराम और आयरन-कैल्शियम की दवाओं का नियमित सेवन बेहद जरूरी है,” वह बताती हैं।
इन नर्सों की भूमिका केवल अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहती। गर्भधारण से लेकर माँ और नवजात को सुरक्षित एवं स्वस्थ जीवन की शुरुआत देने तक वे एक संवेदनशील, भरोसेमंद और जीवनरक्षक कड़ी बनकर साथ निभाती हैं।












