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बस्ती में भ्रष्टाचार की ‘सड़क’: घटिया ईंटों से हो रहा निर्माण, जनता पूछ रही सवाल..सीएम योगी के ‘जीरो टॉलरेंस’ को ठेंगा: रुधौली में विकास के नाम पर प्रधान का ‘खेला’

बस्ती/रुधौली: उत्तर प्रदेश सरकार भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का दावा करती है, लेकिन बस्ती जिले के रुधौली विकासखंड में जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। ग्राम पंचायत मल्हवार के तेलौरा गांव में विकास के नाम पर सरकारी धन की बंदरबांट का एक ताजा मामला सामने आया है। यहां वर्षों बाद बन रही खड़ंजा सड़क में मानकों को ताक पर रखकर सरेआम घटिया और पीली ईंटों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस घटना ने एक बार फिर स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली और पंचायत स्तर पर हो रहे विकास कार्यों की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

सोशल मीडिया का दिखावा ही बना भ्रष्टाचार का सबूत

जानकारी के अनुसार, तेलौरा गांव में ग्रामीणों की सहूलियत के लिए करीब 3 मीटर चौड़ी खड़ंजा सड़क का निर्माण शुरू हुआ था। लेकिन, शुरुआत से ही इसमें गुणवत्ता की भारी अनदेखी की गई। हैरत की बात यह है कि ग्राम प्रधान द्वारा इसी निर्माण कार्य की तस्वीरें सोशल मीडिया पर ‘विकास कार्य’ के रूप में जोर-शोर से प्रचारित की गईं। हालांकि, यही तस्वीरें अब कथित भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा सबूत बन गई हैं, जिनमें साफ तौर पर दोयम दर्जे की पीली ईंटें देखी जा सकती हैं।

ग्रामीणों में भारी आक्रोश, उठाए तीखे सवाल

सड़क निर्माण में हो रही इस धांधली को लेकर स्थानीय लोगों में भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि निर्माण में इस्तेमाल हो रही सामग्री पूरी तरह से अमानक है।

ग्रामीणों ने सवाल उठाते हुए कहा, क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राज में यही विकास की असली तस्वीर है? क्या अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इस तरह सरकारी धन का दुरुपयोग संभव है?” कार्रवाई न होने से ग्रामीणों का रोष लगातार बढ़ता जा रहा है।

केवल सड़क नहीं, अन्य योजनाओं पर भी संदेह के बादल

यह मामला सिर्फ एक खड़ंजा सड़क तक सीमित नहीं है। सूत्रों और स्थानीय चर्चाओं की मानें तो रुधौली विकासखंड के कई अन्य गांवों में भी भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं। मनरेगा के तहत हुए कार्य, आरसीसी सड़क निर्माण, सोलर लाइट स्थापना और इंटरलॉकिंग जैसे कई विकास कार्यों में भी व्यापक अनियमितताओं की शिकायतें दबी जुबान से की जा रही हैं। आरोप है कि विकास के नाम पर सिर्फ कागजी खानापूर्ति और कमीशनबाजी का खेल चल रहा है।

प्रशासन के रुख पर टिकीं निगाहें

अब गेंद प्रशासन के पाले में है। इस पूरे प्रकरण ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं:

क्या जिलाधिकारी और संबंधित विभागीय अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच कराएंगे?

क्या घटिया सामग्री का इस्तेमाल करने वाले जिम्मेदारों पर कोई दंडात्मक कार्रवाई होगी?

या फिर विकास के नाम पर भ्रष्टाचार की यह ‘सड़क’ यूं ही आगे बढ़ती रहेगी?

जनता अब इन सवालों के जवाब और जमीनी स्तर पर न्याय का इंतजार कर रही है। देखना दिलचस्प होगा कि जीरो टॉलरेंस की नीति इस मामले में कागजों से बाहर निकलकर जमीन पर उतर पाती है या नहीं।

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