लखनऊ। रामकृष्ण वचनामृत पर अपने रविवारीय साप्ताहिक प्रवचन में रामकृष्ण मठ लखनऊ के अध्यक्ष स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि अवतार की अवधारणा भारतीय दर्शन, विशेषकर वैष्णव परंपरा में, ईश्वर के पृथ्वी पर विशेष उद्देश्य से प्रकट होने को दर्शाती है। जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है,तब परमात्मा जीवों की रक्षा,धर्म की स्थापना और दुष्टों के विनाश के लिए अवतार धारण करते हैं। इसका उल्लेख श्रीमद्भगवद्गीता में भी मिलता है। स्वामी ने कहा कि दार्शनिक दृष्टि से ईश्वर असीम, सर्वव्यापी और निराकार माना जाता है,इसलिए उसका सीमित रूप धारण करना वास्तविक परिवर्तन नहीं,बल्कि उसकी दिव्य शक्ति का प्रकट होना माना जाता है। जैसे सूर्य आकाश में एक ही है, लेकिन उसका प्रतिबिंब अनेक जलाशयों में दिखाई देता है,उसी प्रकार परमात्मा अपनी इच्छा और योगमाया से सीमित मानव या अन्य रूप में प्रकट होते हैं,जबकि उनका असीम स्वरूप यथावत बना रहता है।
भगवान के अवतार को समझने से मनुष्य कर्म बंधन से मुक्त हो सकता :स्वामी मुक्तिनाथानंद
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