- परिसीमन और सीटें बढ़ाने का प्रस्ताव चर्चा में
- चुनावी राज्यों के बीच टाइमिंग पर बढ़ा विवाद
नई दिल्ली। भारतीय संसद के बजट सत्र में महिला आरक्षण का मुद्दा अचानक केंद्र में आ गया है और इस पर सियासी टकराव तेज हो गया है। लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही को 16 अप्रैल तक स्थगित किए जाने के पीछे सरकार की मंशा इस अहम विधेयक को आगे बढ़ाने की मानी जा रही है। संकेत हैं कि विस्तारित सत्र में महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने से जुड़े प्रावधानों को प्राथमिकता दी जाएगी।
सरकार जिस कानून को आगे बढ़ा रही है, उसे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के नाम से जाना जाता है। इस कानून के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था के अनुसार इसे लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होना अनिवार्य है। इसी वजह से अब तक इसकी संभावित समयसीमा 2029 के बाद मानी जा रही थी। इसी बीच 4 अप्रैल को नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे पर सरकार का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि उनकी सरकार चाहती है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ 2029 के लोकसभा चुनाव से मिलना शुरू हो। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि इस दिशा में आवश्यक प्रक्रियाओं को तेज किया जाएगा, ताकि संवैधानिक प्रावधानों के तहत समयबद्ध तरीके से इसे लागू किया जा सके।
सूत्रों के अनुसार, सरकार इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए दो बड़े विकल्पों पर विचार कर रही है। पहला, आरक्षण को तय समय से पहले लागू करने के लिए कानूनी रास्ता तलाशना और दूसरा, 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन कर लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या में करीब 50 प्रतिशत तक वृद्धि का प्रस्ताव। यदि ऐसा होता है, तो न केवल सदनों की संरचना बदलेगी, बल्कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संतुलन भी नए सिरे से तय होगा। हालांकि, इस पूरे मसले पर विपक्ष ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और माकपा जैसे दलों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए संबंधित बैठकों का बहिष्कार किया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार चुनावी राज्यों को ध्यान में रखते हुए इस विधेयक को जल्दबाजी में आगे बढ़ा रही है। खास तौर पर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में चुनावी माहौल के बीच इस पहल को राजनीतिक लाभ से जोड़कर देखा जा रहा है।
विपक्ष यह भी पूछ रहा है कि यदि सरकार महिला आरक्षण को लेकर गंभीर थी, तो पहले इस दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए गए। उनका कहना है कि अब चुनावों के ठीक पहले इसे आगे बढ़ाना केवल राजनीतिक संदेश देने की कोशिश है। वहीं, सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है।
संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि सरकार महिलाओं को उनका अधिकार देने के लिए प्रतिबद्ध है और इसका चुनावी राजनीति से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने विपक्ष से सहयोग की अपील की। साथ ही जेपी नड्डा ने भी स्पष्ट किया कि विधायी कार्यों का समय निर्धारण सरकार का अधिकार है। कुल मिलाकर, महिला आरक्षण का मुद्दा अब सामाजिक न्याय के साथ-साथ राजनीतिक रणनीति और संवैधानिक प्रक्रिया के जटिल समीकरण में बदल चुका है, जिस पर आने वाले दिनों में और तीखी बहस की संभावना है।












