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वैश्विक ईंधन संकट से कैसे निपटेगा भारत, क्या है मोदी सरकार का प्लान?

ईरान युद्ध के कारण दुनिया वैश्विक ईंधन संकट से जूझ रही है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। संकट का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीदरलैंड में कहा, ‘अगर एनर्जी क्राइसिस का जल्द हल नहीं निकलता तो दुनिया की बड़ी आबादी गरीबी के दलदल में फंस सकती है। दशकों की उपलब्धियों पर पानी फिर सकता है।’ भारत ने पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था और 2048 तक विकसित भारत बनाने का लक्ष्य तय किया है।

अगर ईंधन संकट का जल्द समाधान नहीं निकला तो यह सपना कोसों दूर जा सकता है। यही कारण है कि भारत सरकार अपनी ईंधन जरूरतों को पूरा करने की रणनीति बनाने में जुट गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त अरब अमीरात के अलावा चार यूरोपीय देशों की यात्रा पर हैं। ईंधन संकट के लिहाज से पीएम मोदी की इस यात्रा को बेहद अहम माना जा रहा है। ऐसे में आइये जानते हैं कि भारत कैसे इस वैश्विक ईंधन संकट से निपट सकता है?

भारत के सामने कौन-कौन से विकल्प?

  • खाड़ी में संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब केवल दो देश हैं, जिनके पास स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बायपास करने की व्यवस्था है। अब संयुक्त अरब अमीरात ने अपने फुजैराह बंदरगाह से ओमान तक नई पाइपलाइन के निर्माण कार्य में तेजी लाने का निर्देश अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी को दिया है। यूएई का लक्ष्य है कि 2027 तक पाइपलाइन चालू हो जाएगी। ओमान की पूर्वी सीमा अरब सागर से लगती है। हाल में भारत और यूएई के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का जो समझौता हुआ है, उसमें फुजैराह में भी तेल भंडार करना शामिल है। अगर अगले साल तक पाइप लाइन तैयार हो जाती है तो भारत बिना स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के सीधे ओमान तट से ही कच्चा तेल आयात कर सकेगा।

  • सऊदी अरब के पास भी करीब 1200 लंबी पाइपलाइन है। यह उसके अब्कैक तेल प्रोसेसिंग केंद्र से लाल सागर पर स्थित यानूब बंदरगाह तक तेल की आपूर्ति करती है। ईरान युद्ध में भी इस पाइपलाइन पर बेहद कम असर पड़ा। भारत के पास अपनी ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने का यह भी एक विकल्प है। लाल सागर के माध्यम से भारत कच्चा तेल सऊदी अरब से खरीद सकता है और किसी भी भारतीय जहाज को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज नहीं जाना पड़ेगा।

  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में यूएई का दौरा किया। इस दौरान दोनों देशों के बीच रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व बढ़ाने पर समझौता हुआ। यह भारत के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। नए समझौते के मुताबिक यूएई भारत में 300 लाख बैरल तक कच्चे तेल का भंडारण करेगा। अभी करीब 60 लाख बैरल कच्चे तेल का भंडारण करता है। नए समझौते के लागू होने के बाद भारत के रणनीतिक भंडार में करीब 40 लाख टन से अधिक कच्चे तेल का इजाफा होगा।

भारत के पास कितने रणनीतिक भंडार?

भारत के पास अभी तीन स्थानों पर पेट्रोलियम के रणनीतिक भंडार हैं। मंगलौर, पडूर और विशाखापत्तनम में बने इन रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार में करीब 38 मिलियन बैरल कच्चा तेल रखने की क्षमता है। इसके अलावा भारत ओडिशा में दो अन्य रणनीतिक भंडार भी बना रहा है।

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एलपीजी संकट से कैसे निपटे की सरकार?

ईरान युद्ध के कारण देशभर में तेल के अलावा गैस भी बड़ा संकट बनकर उभरी है। यही कारण है कि भारत ने यूएई के साथ मिलकर गैस के रणनीतिक भंडार बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। भारत अब 20 से 30 दिनों तक के एलपीजी भंडार बनाने पर विचार कर रहा है। अबू धाबी स्थित इंडियन स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड ने एक समझौता किया है। यह कंपनी गैस भंडारण की संभावनाओं का पता लगाएगी।

तेल आयात में विविधता क्यों ला रहा भारत?

ईरान युद्ध से भारत को सबसे बड़ी सीख यह मिली है कि ऊर्जा के मामले में किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना है। अब भारत अपने ईंधन जरूरतों के मामले में विविधता ला रहा है। भारत पहले जहां 27 देशों से कच्चा तेल खरीदता था। अब 40 देश से तेल की खरीद करता है। हाल ही में भारत ने अर्जेंटीना से तेल खरीदना शुरू किया है। संभावना है कि कुछ समय में वेनेजुएला से भी तेल की खरीद शुरू हो सकती है।

अमेरिका और रूस भी विकल्प

ट्रंप प्रशासन से पहले भारत बड़ी मात्रा में रूस से सस्ता तेल खरीदता था। मगर ट्रंप प्रशासन की टैरिफ धमकी के बाद इसे कम कर दिया। हालांकि संकट की स्थिति में भारत के पास रूस से कच्चा तेल खरीदना अधिक सुरक्षित विकल्प है। भारत अमेरिका से भी बड़ी मात्रा में तेल खरीदता है। अगर इन देशों से अधिक आयात किया जाता है तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के कारण पैदा हुए ईंधन संकट से निपटा जा सकता है।

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एथेनॉल को बढ़ावा

तेल संकट से निपटने की खातिर भारत ने घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ाना शुरू कर दिया है। मगर तब भी 80 फीसद से अधिक कच्चा तेल अन्य देशों से खरीदना पड़ता है। अभी तक पेट्रोल में करीब 20 फीसद एथेनॉल की मिलावट होती है। शरण इसे बढ़ाकर 80 फीसद तक करना चाहती है। इससे कच्चा तेल आयात घटाने में मदद मिलेगी।

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