लखनऊ। “ जब मैंने नर्सिंग शुरू की थी, तब न इतने आधुनिक उपकरण थे,न पर्याप्त स्टाफ और न आज जैसी तकनीक। लेकिन एक चीज तब भी सबसे महत्वपूर्ण थी और आज भी है—मरीज को सुरक्षित घर भेजना।” करीब 43 वर्षों से क्वीन मेरी अस्पताल के प्रसूति विभाग के ऑपरेशन थियेटर की नर्सिंग सुपरिटेंडेंट जेमिमा नर्सिंग पेशे में आए बदलावों की जीवंत गवाह हैं। वर्ष 2018 में सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनके अनुभव और कार्यकुशलता को देखते हुए उन्हें सेवा विस्तार दिया गया। वह बताती हैं कि उनके कार्यकाल के दौरान स्वास्थ्य सेवाओं और नर्सिंग व्यवस्था में धीरे-धीरे कई बड़े बदलाव हुए। “ जब मैंने काम शुरू किया था, तब सुविधाएं सीमित थीं और ज्यादातर काम अनुभव तथा मैन्युअल व्यवस्था के सहारे होता था। मां और बच्चे की स्थिति को देखकर और लगातार निगरानी करके ही समझना पड़ता था कि हालत कैसी है। कई बार अनुभव के आधार पर ही निर्णय लेने पड़ते थे।” वह बताती हैं कि समय के साथ तकनीक और संसाधनों में बड़ा बदलाव आया है। “आज मरीज की स्थिति पर नजर रखने के लिए मॉनिटर, वार्मर और अन्य आधुनिक मशीनें उपलब्ध हैं, जिससे गंभीर मरीजों का समय रहते इलाज हो पाता है और जटिल मामलों को संभालना पहले की तुलना में आसान हुआ है।” वह आगे बताती हैं,“ पहले संक्रमण नियंत्रण को लेकर संसाधन सीमित थे, जबकि अब हाथों की सफाई, सैनिटाइजेशन और संक्रमण से बचाव के स्पष्ट प्रोटोकॉल हैं। उस समय अधिकांश रिकॉर्ड हाथ से तैयार किए जाते थे, लेकिन अब ज्यादातर काम ऑनलाइन हो गया है। लेबर रूम में बच्चे के जन्म से लेकर डिस्चार्ज तक का पूरा विवरण MANTRA ऐप पर दर्ज किया जाता है। ”
जेमिमा बताती हैं कि नर्सिंग प्रशिक्षण के स्वरूप में भी बड़ा बदलाव आया है।
“ हम लोगों ने ज्यादातर काम वरिष्ठजनों के साथ काम करते हुए और अनुभव से सीखा। हमारे समय में अनुशासन बहुत सख्त होता था और वरिष्ठजनों से डर भी लगता था। आज माहौल पहले की तुलना में अधिक दोस्ताना है और प्रशिक्षु खुलकर अपनी बात रख पाते हैं। अब नर्सिंग के लिए जीएनएम और बीएससी नर्सिंग जैसी व्यवस्थित पढ़ाई और प्रशिक्षण की व्यवस्था है। नई नर्सों को आधुनिक तकनीक, नवजात पुनर्जीवन, मॉनिटरिंग और आपातकालीन प्रबंधन की बेहतर ट्रेनिंग मिल रही है।” वह बताती हैं कि पहले मुख्य रूप से सरकारी नर्सिंग कॉलेजों के छात्र ही इंटर्नशिप के लिए आते थे, लेकिन अब निजी कॉलेजों के छात्र भी प्रशिक्षण के लिए आते हैं। “आज की ट्रेनिंग में तकनीक और आधुनिक उपकरणों की जानकारी अधिक है। फिर भी कई छात्र बताते हैं कि यहाँ उन्हें ऐसे गंभीर केस देखने और सीखने को मिलते हैं, जिनका अनुभव उन्हें कॉलेजों में नहीं मिल पाता।” वह मानती हैं कि तकनीक और संसाधनों के साथ-साथ लोगों की जागरूकता में भी बड़ा बदलाव आया है। “पहले कई परिवार प्रसव और नवजात देखभाल को लेकर उतने जागरूक नहीं थे, जबकि अब संस्थागत प्रसव, स्तनपान, संक्रमण से बचाव और नवजात देखभाल के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ी है। हालांकि एक चीज पहले भी थी और आज भी है—माँ और नवजात को सुरक्षित घर भेजने की जिम्मेदारी और उनके प्रति संवेदनशीलता।” “आज मरीजों की संख्या और गंभीर मामलों का दबाव पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है, लेकिन डॉक्टरों और नर्सों की प्राथमिकता आज भी वही है—मरीज को सुरक्षित और स्वस्थ घर भेजना।” वह एक पुराना मामला याद करते हुए बताती हैं, “साल तो ठीक से याद नहीं है, लेकिन एक महिला को एक साथ तीन बच्चे होने वाले थे। उस समय स्थिति काफी गंभीर थी और कुछ देर के लिए लगा कि कहीं कोई अनहोनी न हो जाए। पूरी टीम कई घंटों तक लगातार लगी रही। डॉक्टरों, नर्सिंग स्टाफ और पैरामेडिकल टीम के समन्वित प्रयासों से उसका सुरक्षित ऑपरेशन किया गया। सबसे बड़ी खुशी तब हुई, जब माँ और तीनों नवजात स्वस्थ होकर सकुशल घर गए।”
वह कहती हैं, “क्वीन मेरी में वर्कलोड पहले भी था, लेकिन आज की तुलना में कम था। यहाँ बहुत गंभीर केस आते हैं। पहले और अब—दोनों समय में डॉक्टरों और नर्सों की यही कोशिश रहती है कि मरीज सुरक्षित और स्वस्थ होकर घर जाए।”
जेमिमा याद करती हैं कि सीमित स्टाफ के कारण कई बार दिवाली और अन्य त्योहार भी अस्पताल में ड्यूटी करते हुए ही बीत जाते थे। “उस समय ड्यूटी केवल नौकरी नहीं, बल्कि जिम्मेदारी होती थी। परिवार का पूरा सहयोग मिला, क्योंकि बिना परिवार के सहयोग के महिला बाहर जाकर काम नहीं कर सकती। यही सहयोग मुझे लगातार काम करने की ताकत देता रहा।”अंतर्राष्ट्रीय नर्सेस दिवस पर वह नई पीढ़ी की नर्सों को संदेश देते हुए कहती हैं, “परिवार और प्रोफेशन दोनों महत्वपूर्ण हैं। जब घर पर हों तो परिवार को समय दें और जब कार्यस्थल पर हों तो पूरी निष्ठा से मरीजों की सेवा करें। तभी आप दोनों जिम्मेदारियों को सही तरीके से निभा पाएंगे।” चार दशकों में तकनीक, ट्रेनिंग और स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप जरूर बदला, लेकिन लेबर रूम में सुरक्षित प्रसव के बाद माँ और नवजात को स्वस्थ देखकर मिलने वाली संतुष्टि आज भी जेमिमा के लिए वैसी ही है, जैसी अपने करियर के शुरुआती दिनों में थी।












