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बालेन शाह की मानसिकता ‘भारत विरोधी’, नेपाल के PM पर रामभद्राचार्य का बड़ा बयान

भारत और नेपाल के रिश्तों को अक्सर एक लाइन में समझाया जाता है, ‘रोटी-बेटी का रिश्ता’। यानी ऐसा रिश्ता जो सिर्फ कूटनीति या राजनीति पर नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी, परिवार, व्यापार और आस्था पर टिका हुआ है। लेकिन हाल के दिनों में नेपाल की नई नीतियों और बयानों ने इस रिश्ते में हल्की-हल्की दरार की चिंता को जन्म देना शुरू कर दिया है। इसी बीच तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्रीरामभद्राचार्य महाराज का बयान आया, और उसने इस बहस को और तेज कर दिया। उन्होंने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की कार्यशैली को ‘भारत-विरोधी मानसिकता’ से जोड़ते हुए सवाल खड़े कर दिए।

दरअसल, जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने 19 अप्रैल 2026 को माता सीता की जन्मस्थली जनकपुरधाम में जानकी नवमी के अवसर पर राम जानकी मंदिर में दर्शन पूजन किया। इस दौरान श्रीरामभद्राचार्य ने मीडिया से भी बातचीत की और स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘बालेन शाह की मानसिकता भारत विरोधी लग रही है। उनकी कार्यशैली भारत-नेपाल के सदियों पुराने मैत्रीपूर्ण संबंधों के खिलाफ है।’ उन्होंने नेपाल की नई सीमा नीति और कस्टम नियमों पर चिंता जताई। कहा कि इससे दोनों देशों के बीच ‘रोटी-बेटी’ के रिश्ते टूट रहे हैं। ये रिश्ते सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि लोगों के दिलों में बसे हैं।

ये बयान कोई साधारण टिप्पणी नहीं था। श्रीरामभद्राचार्य जैसे संत, जो रामकथा के जरिए लाखों लोगों तक पहुंचते हैं, ने इस मुद्दे को उठाकर इसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया। लेकिन बात सिर्फ एक संत के बयान तक सीमित नहीं। असल में नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार ने हाल ही में एक कदम उठाया है, जिसने सीमा के दोनों तरफ तहलका मचा दिया है।

बालेन्द्र शाह, जिन्हें लोग प्यार से बालेन कहते हैं, पहले काठमांडू के मेयर थे। रैपर से राजनेता बने इस युवा नेता ने मार्च 2026 में नेपाल के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। मात्र 35-36 साल की उम्र में वो नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बन गए। उनकी पार्टी ने चुनाव में भारी जीत हासिल की थी। लोग उम्मीद कर रहे थे कि ये नया चेहरा भ्रष्टाचार कम करेगा, युवाओं को नौकरी देगा और देश को आगे ले जाएगा। लेकिन अब उनकी सरकार की एक नीति ने पुराने दोस्त भारत को चिंता में डाल दिया है।

नेपाल सरकार ने कस्टम ड्यूटी (भंसार) को सख्ती से लागू करना शुरू कर दिया है। अब भारत से जो सामान 100 नेपाली रुपये से ज्यादा का हो, उस पर टैक्स लगाना जरूरी है। पहले ये नियम था, लेकिन कोई पालन नहीं करता था। लोग छोटी-मोटी चीजें – जैसे तेल, चीनी, कपड़े, दवाई या घरेलू सामान – बिना टैक्स दिए सीमा पार लाते-जाते थे। अब सशस्त्र पुलिस और कस्टम अधिकारी हर बैग चेक कर रहे हैं। दक्षिणी मैदानी इलाकों में चौकियों पर निगरानी बढ़ गई है।

इसका सीधा असर किस पर पड़ रहा है? मुख्य रूप से मधेशी समुदाय पर। नेपाल के तराई इलाके और भारत के बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र – सीतामढ़ी, मधुबनी, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, दरभंगा, सुपौल – के लोग सदियों से एक-दूसरे से जुड़े हैं। यहां की भाषा, संस्कृति, खान-पान, त्योहार सब एक जैसे हैं। शादी-ब्याह, पूजा-पाठ, व्यापार सब सीमा पार चलता है। लोग कहते हैं, ‘ये रोटी-बेटी का रिश्ता है।’ एक तरफ की बेटी दूसरी तरफ ब्याही जाती है, परिवार दोनों देशों में बंटे रहते हैं। रोजमर्रा की जरूरतें सस्ते भारतीय बाजार से पूरी होती थीं। अब टैक्स लगने से महंगाई बढ़ गई है।

बीरगंज में तो हालात और बिगड़ गए। 19 अप्रैल को जन अधिकार पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भारत-नेपाल मैत्री पुल के पास शंकराचार्य गेट पर धरना दिया। पार्टी अध्यक्ष डॉ. शरद सिंह यादव ने कहा, ‘ये नियम मधेश के लोगों के खिलाफ है। बालेन शाह मधेशी मूल के हैं, लोग उनके प्रधानमंत्री बनने पर खुश थे। लेकिन महज 22 दिन में ही ऐसा नियम लाकर उन्होंने मधेश को निराश किया।’ प्रदर्शनकारियों ने चिल्लाकर कहा, ‘ये अघोषित नाकाबंदी है। सरकार महंगाई रोकने में नाकाम है, लेकिन टैक्स वसूलने पर ध्यान दे रही है।’

स्थानीय लोग बताते हैं कि पहले एक बोतल तेल या चावल का पैकेट लाना आसान था। अब हर छोटी चीज पर टैक्स। छोटे व्यापारी, किसान, घरेलू महिलाएं सबसे ज्यादा परेशान हैं। एक महिला ने मीडिया को बताया, ‘हमारे परिवार के आधे रिश्तेदार भारत में हैं। शादी में सामान लाना-ले जाना बंद हो जाएगा तो रिश्ते कैसे निभेंगे?’

श्रीरामभद्राचार्य ने ठीक यही बात कही। उन्होंने कहा कि नेपाल की कठोर सीमा प्रबंधन नीति से मिथिलांचल के हजारों परिवार प्रभावित हो रहे हैं। ‘ये प्रशासनिक सख्ती सांस्कृतिक और सामाजिक रिश्तों को कमजोर कर रही है। दोनों देशों के बीच विश्वास और सहयोग बनाए रखना जरूरी है।’ उन्होंने बिहार के उन जिलों का नाम लिया जहां नेपाल से रोजाना लोग आते-जाते हैं। धार्मिक स्थल जैसे जनकपुर और अयोध्या का जुड़ाव राम-सीता से है, जो दोनों देशों को और करीब लाता है।

अब सवाल ये है कि नेपाल की सरकार ये कदम क्यों उठा रही है? सरकार का कहना है कि ये राजस्व चोरी रोकने के लिए है। पहले अनौपचारिक व्यापार से नेपाल को नुकसान हो रहा था। स्थानीय बाजार बर्बाद हो रहे थे क्योंकि लोग सस्ता सामान भारत से लाते थे। सरकार चाहती है कि नेपाल में ही चीजें बनें, रोजगार बढ़े और सरकार को टैक्स मिले। बालेन शाह की सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान चला रही है, तो ये कदम भी उसी दिशा में लगता है। लेकिन आलोचक कहते हैं कि 100 रुपये की सीमा बहुत कम है। आजकल एक पैकेट नमक या तेल भी इससे ज्यादा का हो जाता है। इससे आम आदमी परेशान हो रहा है।

नेपाल कांग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियां भी सरकार की आलोचना कर रही हैं। उन्होंने कहा कि ये नियम लोगों के खिलाफ है। खुद राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (RSP) के मधेश प्रदेश अध्यक्ष और सिराहा-4 के तपेश्वर यादव ने सबसे आगे रहकर विरोध किया। खबर है कि उन्होंने मधेश और लुम्बिनी प्रदेश के अन्य सांसदों के साथ एक डेलिगेशन बनाकर गृह मंत्री सुधन गुरुंग से मुलाकात की और सीमा क्षेत्र में आम लोगों को हो रही परेशानी पर कड़ी आपत्ति जताई।उन्होंने कहा कि दशकों से चली आ रही व्यावहारिक नीतियों को नजरअंदाज करके आम लोगों को परेशान करना गलत है।

वहीं, कुछ लोग तो इसे ‘मधेश के खिलाफ साजिश’ तक कह रहे हैं। दूसरी तरफ भारत में भी चिंता है। बिहार के सीमावर्ती इलाकों में व्यापार प्रभावित हो रहा है। भारतीय बाजारों में नेपाली ग्राहक कम आने लगे हैं। छोटे दुकानदार कहते हैं, ‘हमारे यहां से सामान जाता था, अब टैक्स लगने से मांग घटी है।’ लेकिन भारत सरकार ने अभी औपचारिक तौर पर कोई बयान नहीं दिया। दोनों देशों के बीच कूटनीतिक स्तर पर बातचीत हो सकती है।

भारत-नेपाल का रिश्ता कोई साधारण पड़ोसी का नहीं। 1950 का शांति और मैत्री संधि दोनों देशों को खुली सीमा देता है। पासपोर्ट-वीजा की जरूरत नहीं। लोग बिना रोक-टोक आ-जा सकते हैं। ये दुनिया के सबसे पुराने खुले बॉर्डर में से एक है। हजारों साल पुराना सांस्कृतिक जुड़ाव है। भगवान राम की जन्मभूमि अयोध्या और माता जानकी की जन्मभूमि जनकपुर, दोनों देशों को एक सूत्र में बांधते हैं। त्योहार एक साथ मनाए जाते हैं। चैती, दशहरा, दीवाली, छठ पूजा दोनों तरफ एक समान।

मिथिला की माटी में मैथिली भाषा दोनों तरफ बोली जाती है। शादी-ब्याह में एक परिवार की बेटी दूसरे देश चली जाती है। फिर रिश्ते बनते हैं, बच्चे दोनों तरफ पलते हैं। व्यापार भी इसी पर टिका है। नेपाल से जड़ी-बूटियां, चियाँ, नेपाल से आते हैं। भारत से दैनिक उपयोग की चीजें जाती हैं। ये रिश्ता सिर्फ अर्थव्यवस्था नहीं, भावनाओं का है। श्रीरामभद्राचार्य ने ठीक यही याद दिलाया। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के संबंध सिर्फ कूटनीतिक नहीं, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक हैं। प्रशासनिक कठोरता से इन्हें कमजोर नहीं करना चाहिए।

इसके साथ ही उन्होंने दोनों सरकारों से अपील की कि संवाद के जरिए समाधान निकालें। लोगों की भावनाओं का सम्मान करें। ये विवाद सिर्फ एक नीति का नहीं। ये बड़े सवाल उठाता है, खुले बॉर्डर के फायदे और नुकसान क्या हैं? नेपाल जैसे छोटे देश को अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है। भारत से आयात पर निर्भरता कम करनी है। लेकिन ऐसा करते हुए पड़ोसी के साथ रिश्ते खराब न हों, ये भी ध्यान रखना होगा।

बालेन शाह की सरकार अभी नई है। उन्होंने भ्रष्टाचार पर सख्ती, युवा रोजगार, शिक्षा सुधार जैसे वादे किए थे। अब ये कस्टम नीति उनका पहला बड़ा टेस्ट है। अगर ये नीति सही ढंग से लागू हुई और स्थानीय उत्पाद बढ़े तो अच्छा। लेकिन अगर आम लोगों की मुश्किलें बढ़ीं तो विरोध और बढ़ेगा। सीमा पर रहने वाले लोग कहते हैं कि हमारे लिए देश की सीमा सिर्फ एक लाइन है। दिल तो एक हैं। नेपाल-भारत खुली सीमा संवाद समूह ने सरकार से नियम में बदलाव की मांग की है।

दूसरी तरफ श्रीरामभद्राचार्य जैसे संत का बयान लोगों को सोचने पर मजबूर कर रहा है। हिंदू धर्म के बड़े गुरु होने के नाते उनका वजन है। उन्होंने कहा कि बालेन शाह में हिंदुत्व के प्रति प्रेम नजर नहीं आता। ये आरोप विवादास्पद है, लेकिन चर्चा जरूर छेड़ गया। दोनों देशों के लोग जानते हैं कि रिश्ता मजबूत रखना दोनों के हित में है। व्यापार बढ़े, पर्यटन बढ़े, युवा एक-दूसरे के देश में काम करें। राम और सीता की धरती पर विवाद नहीं, प्रेम और सहयोग होना चाहिए।

दोनों देशों का भविष्य एक-दूसरे से जुड़ा है। हिमालय की गोद में बसा नेपाल और गंगा की धरती वाला भारत – दोनों की कहानी एक है। रामकथा की तरह, जहां सीता की खोज में राम ने पुल बांधा, वैसे ही आज भी दोनों देशों को एक-दूसरे का साथ चाहिए। विवाद हों, लेकिन समाधान भी निकले। संवाद से, विश्वास से। भारत और नेपाल का रिश्ता सिर्फ सीमा, व्यापार या राजनीति का नहीं है, यह भावनाओं, आस्था और रोजमर्रा की जिंदगी का रिश्ता है।

ऐसे में कोई भी फैसला, चाहे वह कितना ही ‘प्रशासनिक’ क्यों न हो, अगर लोगों के दिलों को छूता है, तो उसका असर बड़ा होता है। बालेन शाह की सरकार का यह कदम सही है या गलत, यह समय तय करेगा। लेकिन इतना जरूर है कि इसने एक जरूरी बहस छेड़ दी है कि क्या आर्थिक सुधार सामाजिक रिश्तों की कीमत पर होने चाहिए? और सबसे बड़ा सवाल क्या रोटी-बेटी का रिश्ता टैक्स और नियमों से ऊपर है या अब उसे भी कागजों में बांधा जाएगा?

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