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आरबीआई ने डायरेक्टरों के लिए तीन वर्ष का कूलिंग- ऑफ नियम लागू किया

  • लगातार दस वर्ष बोर्ड में रहने वालों को अनिवार्य रूप से पद छोड़ना होगा
  • नए गवर्नेंस नियमों से पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ने की उम्मीद तेज

नई दिल्ली। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने देश के को-ऑपरेटिव बैंकिंग सेक्टर में गवर्नेंस सुधार की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए अर्बन को-ऑपरेटिव बैंकों (यूसीबी) और रूरल को-ऑपरेटिव बैंकों (आरसीबी) के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के लिए नया ‘कूलिंग-ऑफ पीरियड’ लागू कर दिया है। नए नियमों के तहत यदि कोई डायरेक्टर लगातार दस वर्षों तक किसी को-ऑपरेटिव बैंक के बोर्ड में बना रहता है, तो उसे उसके बाद तीन वर्ष तक बोर्ड से बाहर रहना होगा।

केंद्रीय बैंक ने इस संबंध में अंतिम संशोधित दिशा-निर्देश जारी करते हुए इन्हें तत्काल प्रभाव से लागू कर दिया है। आरबीआई ने कहा है कि यह फैसला बैंकिंग रेग्युलेशन एक्ट, 1949 की भावना के अनुरूप को-ऑपरेटिव बैंकों में पारदर्शिता, संस्थागत जवाबदेही और स्वतंत्र निर्णय प्रक्रिया को मजबूत करने के उद्देश्य से लिया गया है। केंद्रीय बैंक का मानना है कि लंबे समय तक एक ही व्यक्ति या समूह का बोर्ड पर प्रभाव बने रहने से निर्णय प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है और संस्थागत संतुलन कमजोर पड़ सकता है। इसी को देखते हुए बोर्ड स्तर पर रोटेशन और नई भागीदारी सुनिश्चित करने की व्यवस्था लागू की गई है।

दरअसल, आरबीआई ने इस विषय पर 8 जनवरी 2026 को ड्राफ्ट संशोधन दिशा-निर्देश जारी किए थे। ड्राफ्ट में निदेशकों की भूमिका, बोर्ड संचालन, जवाबदेही और गवर्नेंस मानकों से जुड़े कई बदलाव प्रस्तावित किए गए थे। इसके बाद बैंकों, विशेषज्ञों और अन्य हितधारकों से सुझाव मांगे गए। समीक्षा और परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद अब केंद्रीय बैंक ने अंतिम नियम अधिसूचित कर दिए हैं। आरबीआई द्वारा जारी ‘अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक्स-गवर्नेंस अमेंडमेंट डायरेक्शंस, 2026’ और ‘रूरल को-ऑपरेटिव बैंक्स-गवर्नेंस अमेंडमेंट डायरेक्शंस, 2026’ में स्पष्ट किया गया है कि कोई भी व्यक्ति लगातार दस वर्ष से अधिक समय तक बोर्ड में नहीं रह सकेगा। दस साल की अवधि पूरी होने के बाद उसे तीन वर्षों तक दोबारा बोर्ड में नियुक्ति नहीं मिल सकेगी। इस दौरान वह केवल बैंक का सामान्य सदस्य या ग्राहक बना रह सकता है, लेकिन किसी प्रशासनिक या बोर्ड संबंधी भूमिका में नहीं रह पाएगा।

बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम को-ऑपरेटिव बैंकिंग सेक्टर में लंबे समय से चली आ रही गवर्नेंस कमजोरियों को दूर करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में कई को-ऑपरेटिव बैंकों में बोर्ड नियंत्रण, प्रबंधन हस्तक्षेप और पारदर्शिता की कमी को लेकर सवाल उठे थे। कुछ मामलों में लंबे समय तक एक ही समूह का प्रभाव बने रहने से संस्थागत स्वतंत्रता प्रभावित होने की आशंका भी सामने आई थी। विशेषज्ञों के अनुसार नए नियमों से बोर्ड स्तर पर नए और पेशेवर चेहरों को अवसर मिलेगा। इससे निर्णय प्रक्रिया में विविधता आएगी और जोखिम प्रबंधन, ऑडिट व्यवस्था तथा आंतरिक नियंत्रण प्रणाली अधिक प्रभावी हो सकेगी। साथ ही किसी एक व्यक्ति या समूह का अत्यधिक प्रभाव सीमित रहेगा।

को-ऑपरेटिव बैंकिंग सेक्टर देश की ग्रामीण और अर्ध-शहरी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। छोटे व्यापारी, किसान, स्वरोजगार से जुड़े लोग और मध्यम वर्गीय ग्राहक बड़ी संख्या में इन बैंकों पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में आरबीआई का यह कदम बैंकिंग प्रणाली की विश्वसनीयता और ग्राहकों के भरोसे को मजबूत करने की दिशा में अहम माना जा रहा है।

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