- महंगी बिजली खरीदकर निजी कंपनी को कम दर पर देने की व्यवस्था पर उठाए सवाल
लखनऊ I कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि आगरा और ग्रेटर नोएडा में विद्युत वितरण का कार्य कर रही निजी कंपनियों का भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) से व्यापक एवं स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। साथ ही, आगरा अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी तथा ग्रेटर नोएडा की निजी विद्युत वितरण व्यवस्था की वित्तीय, तकनीकी और कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा कराई जाए।
संघर्ष समिति ने कहा कि सार्वजनिक क्षेत्र की बिजली व्यवस्था को निजी हाथों में सौंपने से पहले सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पिछले 16 वर्षों से आगरा में चल रही निजी फ्रेंचाइजी व्यवस्था से उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन और प्रदेश के उपभोक्ताओं को क्या लाभ मिला है। यदि निजीकरण को दक्षता, आर्थिक लाभ और बेहतर उपभोक्ता सेवा का मॉडल बताया जा रहा है तो आगरा और ग्रेटर नोएडा के निजीकरण के परिणामों का निष्पक्ष और पारदर्शी मूल्यांकन सरकार को सार्वजनिक करना चाहिए।
संघर्ष समिति ने आगरा फ्रेंचाइजी में बिजली खरीद और बिक्री की दरों का उदाहरण देते हुए कहा कि वर्ष 2025-26 में उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन ने टोरेंट पावर को लगभग 2400 मिलियन यूनिट बिजली ₹4.55 प्रति यूनिट की दर से उपलब्ध कराई, जबकि उसी अवधि में पावर कॉरपोरेशन की औसत बिजली खरीद लागत लगभग ₹5.85 प्रति यूनिट रही। अर्थात पावर कॉरपोरेशन ने अपनी औसत खरीद लागत से लगभग ₹1.30 प्रति यूनिट कम दर पर बिजली उपलब्ध कराई, जिससे केवल एक वर्ष में लगभग ₹312 करोड़ की वित्तीय क्षति का प्रश्न सामने आता है।
संघर्ष समिति ने कहा कि इससे पहले भी 1 अप्रैल 2010 से 31 मार्च 2024 तक पावर कॉरपोरेशन द्वारा महंगी दरों पर बिजली खरीदकर टोरेंट पावर को अपेक्षाकृत कम दर पर उपलब्ध कराने के कारण लगभग ₹2,434 करोड़ की क्षति का आंकड़ा सामने आया था। वर्ष 2024-25 तथा चालू वित्तीय वर्ष की क्षति को जोड़ने पर आगरा फ्रेंचाइजी के कारण पावर कॉरपोरेशन को ₹3,000 करोड़ से अधिक की वित्तीय क्षति होने का आरोप है। इसके अतिरिक्त पावर कॉरपोरेशन के राजस्व का लगभग ₹2,200 करोड़ बकाया होने का भी प्रश्न उठाया गया है।
संघर्ष समिति ने कहा कि ये आंकड़े अत्यंत गंभीर हैं और इनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। यदि सार्वजनिक क्षेत्र महंगी दर पर बिजली खरीदकर निजी कंपनी को कम दर पर बिजली उपलब्ध कराता है और इसका आर्थिक बोझ पावर कॉरपोरेशन तथा अंततः प्रदेश की जनता पर पड़ता है, तो सरकार को यह बताना चाहिए कि ऐसी व्यवस्था को निजीकरण की सफलता कैसे माना जा सकता है।
संघर्ष समिति ने कहा कि निजी कंपनियों के वित्तीय लेन-देन, बिजली खरीद-बिक्री की दरों, सरकारी रियायतों, राजस्व, लाभ-हानि, परिसंपत्तियों, संविदात्मक दायित्वों तथा उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले वित्तीय प्रभाव की स्वतंत्र जांच जरूरी है। इसलिए आगरा और ग्रेटर नोएडा की निजी बिजली कंपनियों का सीएजी ऑडिट कराया जाना चाहिए।
संघर्ष समिति ने कहा कि दिल्ली में निजी बिजली वितरण कंपनियों के सीएजी ऑडिट से संबंधित न्यायिक निर्णय के परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश में भी सार्वजनिक सेवा से जुड़े निजी बिजली वितरण कारोबार की वित्तीय जवाबदेही और पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। बिजली वितरण कोई सामान्य व्यावसायिक गतिविधि नहीं, बल्कि करोड़ों उपभोक्ताओं से सीधे जुड़ी अत्यावश्यक सार्वजनिक सेवा है। इसलिए निजी कंपनियों को सार्वजनिक जवाबदेही से बाहर नहीं रखा जा सकता।
संघर्ष समिति ने ग्रेटर नोएडा की निजी बिजली कंपनी के संबंध में भी गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि कंपनी द्वारा करार के तहत विद्युत उत्पादन संयंत्र स्थापित करने सहित जिन दायित्वों को स्वीकार किया गया था, उनकी पूर्ति की स्थिति की भी जांच होनी चाहिए। कंपनी के वित्तीय लेन-देन, करार की शर्तों, सरकारी सुविधाओं एवं रियायतों, विद्युत आपूर्ति व्यवस्था तथा उपभोक्ताओं के हितों पर पड़ने वाले प्रभाव की भी स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
संघर्ष समिति ने मुख्यमंत्री से मांग की है कि—आगरा और ग्रेटर नोएडा की निजी बिजली कंपनियों का सीएजी से व्यापक एवं स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए। आगरा अर्बन डिस्ट्रीब्यूशन फ्रेंचाइजी करार की तत्काल पुनर्समीक्षा की जाए। बिजली खरीद और निजी कंपनी को बिजली उपलब्ध कराने की दरों के अंतर से हुए नुकसान की स्वतंत्र जांच कराई जाए। पावर कॉरपोरेशन के निजी कंपनी पर बकाया राजस्व तथा अन्य वित्तीय देनदारियों की स्थिति सार्वजनिक की जाए।ग्रेटर नोएडा की निजी कंपनी द्वारा करार के तहत किए गए सभी दायित्वों के अनुपालन की जांच की जाए। सीएजी ऑडिट और स्वतंत्र जांच के निष्कर्षों के आधार पर जनहित के विरुद्ध पाए जाने वाले करारों को निरस्त करने पर विचार किया जाए। संघर्ष समिति ने कहा कि घाटे का हवाला देकर सार्वजनिक बिजली निगमों को निजी हाथों में सौंपने की वकालत करने वाले पावर कॉरपोरेशन प्रबंधन को पहले आगरा और ग्रेटर नोएडा के निजीकरण का पूरा हिसाब देना चाहिए। यदि निजीकरण वास्तव में आर्थिक रूप से लाभकारी और उपभोक्ता हित में है तो सरकार को सीएजी ऑडिट से पीछे हटने का कोई कारण नहीं होना चाहिए।
संघर्ष समिति ने स्पष्ट किया कि बिजली व्यवस्था का उद्देश्य निजी कंपनियों का मुनाफा बढ़ाना नहीं, बल्कि प्रदेश के किसानों, मजदूरों, घरेलू उपभोक्ताओं, छोटे व्यापारियों और उद्योगों को विश्वसनीय, सस्ती एवं सार्वभौमिक बिजली उपलब्ध कराना है। इसलिए बिजली क्षेत्र में कोई भी नीतिगत निर्णय सार्वजनिक हित, पारदर्शिता और सामाजिक जवाबदेही के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।












