नवाबगंज क्षेत्र के बक्शी गांव में मोहर्रम के मौके पर आस्था और श्रद्धा का अनूठा स्वरूप देखने को मिला। यहां पैगम्बर मुहम्मद साहब के रौजे की खूबसूरत झांकी सजाई गई, जिसकी जियारत के लिए देर रात तक बड़ी संख्या में अकीदतमंद पहुंचते रहे। धार्मिक माहौल और अकीदत ने पूरे गांव को आध्यात्मिक रंग में रंग दिया। गुरुवार शाम से शुरू हुई रौजे की तैयारी
मोहर्रम के अवसर पर बक्शी गांव में गुरुवार शाम अकीदतमंदों ने रौजे की झांकी तैयार करनी शुरू की। विशेष सजावट और पारंपरिक शैली में तैयार की गई इस झांकी ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया। रात होते-होते जियारत के लिए श्रद्धालुओं का पहुंचना शुरू हो गया। ताजिया परंपरा के साथ रौजे की जियारत की भी मान्यता
दशवीं मोहर्रम के अवसर पर आमतौर पर हजरत इमाम हुसैन की याद में छोटी-बड़ी ताजिया रखी जाती हैं, लेकिन कई स्थानों पर अकीदतमंद पैगम्बर मुहम्मद साहब के रौजे की प्रतीकात्मक झांकी भी तैयार करते हैं। अकीदतमंद शरीफ अहमद ने बताया कि यह श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने की एक पारंपरिक धार्मिक अभिव्यक्ति मानी जाती है। स्थानीय लोगों ने तैयार किया आकर्षक रौजा
बक्शी गांव निवासी जलील अहमद और सलीम अहमद ने इस रौजे को तैयार किया। सजावट और प्रस्तुति को लेकर विशेष ध्यान दिया गया, जिससे इसकी धार्मिक गरिमा बनी रहे। स्थानीय लोगों ने भी आयोजन को सफल बनाने में सहयोग किया। पूरी रात चलती रही जियारत
गुरुवार रात अकीदतमंदों का सिलसिला लगातार जारी रहा। लोग रौजे की जियारत कर दुआएं मांगते रहे और धार्मिक भावनाओं के साथ अपनी अकीदत पेश करते रहे। गांव में देर रात तक श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रही। दूर-दूर से पहुंचे श्रद्धालु
उस्मान कादरी ने बताया कि रौजे की जियारत के लिए आसपास ही नहीं बल्कि दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचे थे। श्रद्धालुओं ने इसे आध्यात्मिक अनुभूति और धार्मिक जुड़ाव का विशेष अवसर बताया। आस्था और सौहार्द का बना संदेश
मोहर्रम के इस आयोजन ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सौहार्द का भी संदेश दिया। लोगों ने अमन, भाईचारे और खुशहाली की दुआ मांगी। आयोजन शांतिपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ और लोगों ने इसे श्रद्धा का विशेष अवसर बताया।
मोहर्रम पर सजा पैगम्बर साहब के रौजे की झांकी:पूरी रात उमड़ी अकीदतमंदों की भीड़, दूर-दूर से पहुंचे लोग
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