हाल ही में उज्ज्वला योजना के तहत मिलने सब्सिडी वाले LPG सिलेंडर की संख्या घटा दी गई। साल 2016 में कुल 12 सिलेंडर सालाना देने का फैसला हुआ था और 10 साल में यह संख्या घटकर 4 पर आ गई है। 10 करोड़ से ज्यादा लाभार्थियों वाली इस योजना पर सालाना हजारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। कनेक्शन बांटने, सिलिंडर पर सब्सिडी देने और अन्य खर्च को मिलाकर हर साल एक मोटी रकम खर्च करनी पड़ रही है। शायद यही वजह है कि बीते कुछ साल में उज्ज्वला योजना के तहत दिए जाने वाले सिलेंडर की संख्या में कमी की गई है और 10 साल में तीन गुना की कटौती की जा चुकी है।
मौजूदा वक्त में उज्ज्वला योजना के लाभार्थी जब गैस सिलेंडर भरवा लेते हैं तो कुछ दिन में 300 रुपये की सब्सिडी उनके बैंक खाते में आ जाती है। मई 2022 में सब्सिडी की शुरुआत 200 रुपये प्रति सिलेंडर के हिसाब से की गई थी। अक्टूबर 2023 में इसे बढ़ाकर 300 रुपये कर दिया गया। हालांकि, अगस्त 2025 से पहले कुल 12 सिलेंडर पर सब्सिडी दी जा रही थी। फिर इसे 9 किया गया और अब जून 2026 में इसे घटाकर 4 कर दिया गया है।
इस कमी के बारे में पेट्रोलियम मंत्रालय का कहना है कि उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों की सालाना औसत खपत को ध्यान में रखते हुए यह बदलाव किया गया है। मंत्रालय के मुताबिक सरकार, एक सिलेंडर की लागत लगभग 1600 रुपये है लेकिन सब्सिडी पर सस्ता सिलेंडर उपलब्ध कराने के लिए सरकार लगभग 1000 रुपये प्रति सिलेंडर खर्च कर रही है।
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योजना से क्या हासिल हुआ?
अगर इस योजना के चलते देश को हुए लाभ को देखें तो सरकार का दावा है कि इससे कार्बन उत्सर्जन में कमी आई है, स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ा है और खाना बनाने वाले लोगों को चूल्हे के धुएं से राहत मिली है। गैस का इस्तेमाल कितना बढ़ा इसकी गवाही सरकारी आंकड़े देते हैं। साल 2014-15 में LPG की जो खपत 17696 हजार मीट्रिक टन थी, वह 2024-25 में 31986 मीट्रिक टन तक पहुंच गई यानी 10 साल में 81 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वहीं, घरेलू ग्राहकों की संख्या 1 अप्रैल 2014 को 14.52 करोड़ थी और 1 अप्रैल 2025 तक यह संख्या 32.94 करोड़ पहुंच गई।
10 साल में कितने हुए लाभार्थी?
इसी योजना के बारे में सांसद राजेश रंजन और कौशलेंद्र कुमार ने मार्च 2026 में लोकसभा में सवाल पूछा था। इसका जवाब केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 19 मार्च 2026 को लिखित रूप में दिया। अपने जवाब में हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि 1 मार्च 2026 तक प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत कुल 10.56 करोड़ कनेक्शन बांटे जा चुके थे। 1 अगस्त 2025 तक बांटे गए कुल 9.54 कनेक्शन में से 2.95 करोड़ कनेक्शन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लाभार्थियों को दिए गए थे।
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तब उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार 14.2 किलो वाले कुल 9 सिलेंडर पर प्रति सिलेंडर की दर से 300 रुपये की सब्सिडी देर रही थी। उन्होंने बताया कि तमाम उपायों के चलते प्रति कनेक्शन खपत में बढ़ोतरी हुई है। साल 2021-22 में जो खपत 3.68 सिलेंडर प्रति लाभार्थी थी वह 2025-26 में बढ़कर 4.80 तक पहुंच गई। इसी जवाब में उन्होंने यह भी बताया कि साल 2024-25 में ही PMUY के लाभार्थियों ने कुल 46.22 करोड़ सिलेंडर भरवाए।
कई चरण में बांटे गए कनेक्शन
इस योजना पर हो रहे खर्च से जुड़ा एक सवाल सांसद सोमेंदु अधिकारी ने पूछा था। इसका जवाब पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय के राज्यमंत्री सुरेश गोपी ने 12 मार्च 2026 को दिया था। इस जवाब में उन्होंने बताया कि 8 करोड़ गरीब परिवारों को PMUY के तहत गैस कनेक्शन देने का लक्ष्य सितंबर 2019 में ही पूरा हो गया था। बाकी बचे गरीब परिवारों तक लाभ पहुंचाने के लिए अगस्त 2021 में उज्ज्वला 2.0 लॉन्च की गई थी। इसके तहत 1 करोड़ अतिरिक्त परिवारों तक कनेक्शन दिए जाने थे और यह लक्ष्य भी जनवरी 2022 में पूरा हो गया।
इसके बाद सरकार ने 60 लाख और कनेक्शन बांटने का लक्ष्य रखा गया और दिसंबर 2022 तक उज्ज्वला 2.0 के तहत भी 1.60 करोड़ कनेक्शन बांट दिए गए। इसके बाद 75 लाख और कनेक्शन बांटने का लक्ष्य तय हुआ और जुलाई 2024 तक यह लक्ष्य भी पूरा कर लिया गया। फिर वित्त वर्ष 2025-26 में भी 25 लाख कनेक्शन बांटने का लक्ष्य रखा गया।

सब्सिडी पर कितने हुए खर्च?
जैसा कि सरकार ने अपने जवाब में बताया कि 1 मार्च तक इस योजना के तहत कुल 10.56 करोड़ कनेक्शन दिए जा चुके थे। सोमेंदु अधिकारी के सवाल के जवाब में सरकार ने यह भी बताया कि इस योजना के तहत मई 2022 में सब्सिडी बांटने की शुरुआत की गई। शुरुआत में प्रति सिलेंडर सब्सिडी 200 रुपये रखी गई थी। बाद में इसे बढ़ाकर 300 रुपये कर दिया गया। 2025-26 में सालाना 9 सिलेंडर पर 300 रुपये की सब्सिडी की योजना रखी गई। अब इसी को 4 सिलेंडर सालाना कर दिया गया है।
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योजना के लाभार्थियों को सीधी सब्सिडी देने पर पिछले पांच साल में सरकार ने कुल 45432.24 करोड़ रुपये खर्च किए हैं। इसमें सब्सिडी के आंकड़े मई 2022 से लिए गए हैं क्योंकि सब्सिडी देने की शुरुआत तब से ही हुई थी। ये आंकड़े फरवरी 2026 तक के हैं। इस सब्सिडी के अलावा, साल 2022-23 में तेल कंपनियों को 22,000 करोड़ का मुआवजा दिया गया। 2025-26 के लिए भी 30 हजार करोड़ के मुआवजे को मंजूरी दी गई है।

सिलेंडर कम करके पैसे बचाएगी सरकार?
साल 2024-25 में उज्जवला योजना के लाभार्थियों ने कुल 46.22 करोड़ सिलेंडर भरवाए। एक सिलेंडर पर 300 रुपये की सब्सिडी मिलती है। इस तरह एक साल में 10866 करोड़ रुपये सिर्फ सब्सिडी पर खर्च किए दिए गए। हालांकि, इसी साल सरकार के खजाने से सब्सिडी के नाम पर 12700 करोड़ रुपये खर्च हुए। यह सब्सिडी सालाना 9 सिलिंडर के हिसाब से थी। अब उम्मीद जताई जा रही है कि सब्सिडी वाले सिलेंडर की संख्या 4 कर दिए जाने से इस राशि में कमी आएगी और सरकार के कुछ पैसे बच जाएंगे।
दिसंबर 2025 में सांसद वी के श्रीकंदन के एक सवाल के जवाब में केंद्रीय पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने जवाब दिया था कि साल 2024-25 में लगभग 86 प्रतिशत लाभार्थी ऐसे थे जिन्होंने कम से कम एक सिलिंडर जरूर भरवाया। सिलिंडर कम भरवाने जाने की समस्या से निपटने के लिए मंत्रालय ने जनवरी 2025 में ही एक स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी किया था। इसके तहत ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (OMCs) ने पता लगाया कि 11.7 लाख कनेक्शनधारी ऐसे थे जिन्होंने कनेक्शन लेने के बाद दोबारा कभी सिलिंडर ही नहीं भरवाया।
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नवंबर 2025 तक चिह्नित किए गए इन 11.7 लाख लाभार्थियों में से 8.35 लाख ने अपना e-KYC पूरा करवाया। इसमें से 5.52 लाख ने फिर से रीफिल भी करवाया। इसी प्रक्रिया के तहत 21 हजार कनेक्शन रद्द भी कर दिए गए।
भारी पड़ रहा खर्च?
अगर 10.56 करोड़ सिलेंडर की संख्या के लिहाज से देखें 9 सिलेंडर के हिसाब से भरवाए जाने वाले सिलेंडर की संख्या 95.04 करोड़ रुपये होती है। हालांकि, 2024-25 में सिर्फ 46.22 करोड़ सिलेंडर ही भरवाए गए। औसत देखें तो एक ग्राहक का लगभग 4 सिलेंडर सालाना ही बनता है। अब सरकार का भी कहना है कि औसतन लोग कम सिलेंडर ही भरवा रहे हैं इसलिए इस संख्या को 4 किया जा रहा है।
अगर इस योजना के पर अब तक खर्च हुए पैसों का हिसाब-किताब देखें तो कनेक्शन बांटने, सब्सिडी देने और OMCs को मुआवजा देकर सरकार ने अभी तक इस योजना पर कम से कम 1,14,954 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। अभी भी हर साल लगभग 10 से 30 हजार करोड़ रुपये इस योजना पर खर्च हो रहे हैं। ऐसे में सरकार अब धीरे-धीरे इस योजना को सीमित करती जा रही है।












