पिछले कुछ सालों से विदेश में पढ़ाई या नौकरी का सपना देखने वाले भारतीयों के सामने मुश्किलों का पहाड़ खड़ा हो गया है। कई भारतीय अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन जैसे देशों में नौकरी या पढ़ाई के लिए जाते थे लेकिन पिछले कुछ सालों में इन देशों ने नियमों को सख्त कर दिया है। इसका असर भारतीय छात्रों के इन देशों में पढ़ाई के लिए जाने, वर्क परमिट और स्थायी निवास (PR) के मौकों पर भी दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलिया ने स्किल्ड प्रोफेशनल्स की जरूरत को देखते हुए कई क्षेत्रों में भारतीयों के लिए अवसर बढ़ाए हैं। ऐसे में अब भारतीयों का रुख तेजी से इन देशों की ओर हो रहा है।
अमेरिका लंबे समय से भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहा है। 2024-25 शैक्षणिक सत्र में अमेरिका में 3.63 लाख से अधिक भारतीय छात्र पढ़ रहे थे, जो किसी भी देश के छात्रों में सबसे अधिक हैं। हालांकि, जब से ट्रंप दूसरी बार राष्ट्रपति बने हैं तो उन्होंने वीजा के नियमों को सख्त किया है और अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं।
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अमेरिका का वीजा लेना मुश्किल
हाल के वर्षों में वीजा जांच, इंटरव्यू प्रक्रिया, प्रोसेसिंग में देरी और पढ़ाई के बाद रोजगार से जुड़े नियमों में बदलाव ने छात्रों की चिंता बढ़ाई है। नई अमेरिकी नीतियों के तहत छात्र वीजा की अवधि, ऑप्शन्ल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) और इमिग्रेशन नियम पहले की तुलना में अधिक सख्त किए जा रहे हैं। कई अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने भी अंतरराष्ट्रीय छात्रों को समय रहते यात्रा और डॉक्यूमेंट पूरे करने की सलाह दी जा रही है ताकि उन्हें किसी तरह की मुश्किलों का सामना ना करना पड़े।
कनाडा ने भी सख्त किए नियम
कनाडा ने 2024 से अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या सीमित करने के लिए स्टडी परमिट पर कैप लागू की। इसके साथ वित्तीय दस्तावेजों की जांच और वीजा मंजूरी की प्रक्रिया भी पहले से कड़ी कर दी गई। इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय छात्रों पर पड़ा। रिपोर्ट्स के अनुसार, 20025 में भारतीय छात्रों के स्टडी परमिट आवेदनों का रिजेक्शन रेट 70 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच गई, जबकि दो साल पहले यह काफी कम थी। कनाडा सरकार का कहना है कि यह कदम आवास, शिक्षा व्यवस्था और इमिग्रेशन सिस्टम पर बढ़ते दबाव को कंट्रोल करने के लिए उठाया गया है।
लोकसभा में एक सवाल के जवाब में शिक्षा मंत्रालय ने इस बारे में बताया कि 2026 में भारत से हायर एजुकेशन के लिए कनाडा जाने वाले युवाओं में कमी आई है। हालांकि, उन्होंने इसके पीछे कनाडा सरकार की वीजा नीतियों को जिम्मेदार ठहराया। जवाब में कहा गया है कि कनाडा सरकार ने इंटरनेशल स्टूडेंट्स पर कैप लगाया और कई नियम सख्त किए जिसके कारण भारतीय छात्रों को वीजा मिलना मुश्किल हो गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत के 127,375 छात्रों ने साल 2024 में कनाडा के कॉलेजों में एडमिशन लिया था लेकिन यह आंकड़ा 2025 में कम होकर 98,770 रह गया था।
ब्रिटेन ने क्या किया?
ब्रिटेन ने भी अंतरराष्ट्रीय छात्रों से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। 2024 से अधिकांश विदेशी छात्रों के लिए अपने साथ आश्रित (माता-पिता या पति-पत्नी, बच्चे) ले जाने पर रोक लगा दी गई। इसके बाद पोस्ट-स्टडी वर्क रूट को लेकर भी सख्ती की घोषणा की गई और इसे दो वर्ष से घटाकर 18 महीने करने का प्रस्ताव सामने आया। इन बदलावों का असर भारतीय छात्रों पर भी पड़ा, क्योंकि भारत उन देशों में शामिल है जहां से बड़ी संख्या में छात्र ब्रिटेन पढ़ने जाते हैं। हालांकि, शुरुआती गिरावट के बाद कुछ समय के लिए आवेदन बढ़े, लेकिन कुल मिलाकर नियम पहले की तुलना में अधिक सख्त हो गए हैं।
ऑस्ट्रेलिया बन रहा विकल्प
जहां अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन ने इमिग्रेशन और छात्र वीजा नियमों को कड़ा किया है, वहीं ऑस्ट्रेलिया कई क्षेत्रों में कुशल कर्मचारियों की कमी पूरी करने के लिए विदेशी प्रोफेशनल्स को आकर्षित कर रहा है। ऑस्ट्रेलिया का स्किल्ड वर्कर वीजा भारतीय आईटी, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर और तकनीकी क्षेत्र के पेशेवरों के बीच तेजी से लोकप्रिय हुआ है।
ऑस्ट्रेलियाई गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में भारतीय नागरिकों को सबसे अधिक स्किल्ड वीजा जारी किए गए और भारत इस श्रेणी में शीर्ष देशों में शामिल रहा। हालांकि, ऑस्ट्रेलिया ने भी छात्र वीजा फीस बढ़ाई है और कुल इंटरनेशनल स्टूडेंट्स की संख्या पर नियंत्रण के लिए कदम उठाए हैं, लेकिन स्किल्ड माइग्रेशन के क्षेत्र में भारतीयों के लिए अवसर अभी भी मजबूत बने हुए हैं।
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युवा बदल रहे मन
विदेशी शिक्षा सलाहकारों का कहना है कि अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में बढ़ती सख्ती के कारण अब भारतीय छात्र जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड, आयरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों की ओर भी तेजी से रुख कर रहे हैं। यूरोपीय देशों ने स्किल बेस्ड नौकरी और पढ़ाई के बाद काम करने के अवसर बढ़ाए हैं, जिससे भारतीय छात्रों के लिए नए विकल्प खुल रहे हैं। हालिया रिपोर्ट्स में भी कहा गया है कि बदलती वीजा नीतियों के कारण भारतीय छात्रों का विदेश में पढ़ाई का रुझान अब पहले की तुलना बदल रहे हैं। इसके साथ ही छात्र अपने बजट को देखकर भी इन देशों में जाने का फैसला कर रहे हैं।












