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शिवगंगा में मिला 13वीं शताब्दी का शिलालेख, वैष्णव आचार्य और मंदिर व्यवस्था का उल्लेख


सूचना पर विशेषज्ञों ने स्थल का किया निरीक्षण 

शिवगंगा। तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में शोधकर्ताओं ने 13वीं शताब्दी ईस्वी का एक महत्वपूर्ण शिलालेख खोजा है। तिरुप्पत्तूर के निकट कारैयूर पुदुवलवु स्थित वण्णिक्कण्माय (तालाब) के किनारे मिले इस शिलालेख से क्षेत्र के धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक महत्व से जुड़ी कई नई जानकारियां सामने आई हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, शिलालेख में एक वैष्णव आचार्य की आध्यात्मिक सेवाओं का उल्लेख है, जिन्होंने लोगों को वेदों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी थी।
शिलालेख की जानकारी सबसे पहले कारैयूर पुदुवलवु गांव के छात्र सुरेश ने विशेषज्ञों को दी। सूचना मिलने पर शिवगंगा पुरातत्व अध्ययन समूह के संस्थापक का. कालीरासा, सचिव इरा. नरसिम्हन तथा कारैकुडी अलगप्पा सरकारी कला महाविद्यालय के इतिहास विभाग के सह-प्राध्यापक वेलायुधराजा ने मौके पर पहुंचकर स्थल का निरीक्षण किया।
शोधकर्ताओं ने बताया कि तालाब के किनारे मिला यह शिलालेख लगभग दो फुट लंबा है और इसमें सात पंक्तियां उत्कीर्ण हैं। शिलालेख के अंतिम भाग में पूर्ण कुंभ तथा उसके दोनों ओर पारंपरिक कुत्थु दीप अंकित हैं। लिपि और शैली के आधार पर इसका समय 13वीं शताब्दी ईस्वी का माना गया है।
शिलालेख में अंकित पाठ “स्वस्तिश्री वण्णक्क नल्लूर मेवि क् कुलम् सियर वेद नेरि काट्टिनान सियर रक्षै” से संकेत मिलता है कि वण्णक्क नल्लूर नामक ग्राम के तालाब के आसपास निवास करने वाले एक वैष्णव आचार्य (सीयर) ने लोगों को वेदों का मार्ग दिखाया और उनके आध्यात्मिक कल्याण के लिए कार्य किया।
शोधकर्ताओं ने बताया कि कारैयूर स्थित अलगिया मणवाल पेरुमाल मंदिर में प्रथम मारवर्मन सुंदरपांडियन और सडैयवर्मन सुंदरपांडियन के काल के शिलालेखों में भी वण्णक्क नल्लूर का उल्लेख मिलता है। उन अभिलेखों में “वण्णक्क नल्लूर दूतन आंडपिल्लै” के हस्ताक्षर भी दर्ज हैं, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक महत्व की पुष्टि करते हैं।
शिलालेख से यह भी जानकारी मिलती है कि कारैयूर के अलगिया मणवाल पेरुमाल मंदिर के नंबिमार (मंदिर सेवकों) के लिए कारैयूर, मणक्कुडी, वण्णक्क नल्लूर, थोट्टूर, उगलूर और पनैवयल गांवों में ‘तिरुविडैयाट्टम’के रूप में कर-मुक्त धार्मिक दान भूमि उपलब्ध थी। इससे उस समय मंदिरों की आर्थिक व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं को मिलने वाले संरक्षण का भी पता चलता है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, तालाब के समीप स्थित अय्यनार मंदिर को आज भी वन्निकुन्नि अय्यनार मंदिर कहा जाता है, जबकि तालाब वण्णिक्कण्माय के नाम से जाना जाता है। इन नामों और शिलालेख में दर्ज विवरणों के आधार पर माना जा रहा है कि प्राचीन काल में पूरा क्षेत्र वण्णक्क नल्लूर के नाम से प्रसिद्ध था।
अध्ययन के दौरान अय्यनार मंदिर की प्राचीन प्रतिमा भी शोधकर्ताओं के आकर्षण का केंद्र रही। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में ग्राम-रक्षक देवता के रूप में पूजे जाने वाले अय्यनार सामान्यतः अपनी दो देवियों पूर्णा और पुष्पकला के साथ दर्शाए जाते हैं। हालांकि, इस मंदिर में अय्यनार अकेले उत्कुटि आसन (बैठी हुई मुद्रा) में विराजमान हैं, जो इस प्रतिमा की विशिष्टता को दर्शाता है।
प्रतिमा में सिर पर जटाभार, ललाट पर कण्णि माला, वक्षस्थल पर सन्नवीरम्, कानों में मकर कुंडल, कमर पर उदरबन्ध तथा दाहिने हाथ में सेंडै धारण किए हुए दिखाया गया है। बायां हाथ दंड हस्त मुद्रा में है और समीप दो हाथी वाहन भी अंकित हैं। प्रतिमा की शैली और शिल्प के आधार पर शोधकर्ताओं का मानना है कि यह मूर्ति भी 12वीं या 13वीं शताब्दी की हो सकती है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज न केवल शिवगंगा जिले के प्राचीन इतिहास पर नई रोशनी डालती है, बल्कि मध्यकालीन तमिल समाज, वैष्णव परंपरा, मंदिर व्यवस्था और ग्राम संरचना के अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण साक्ष्य उपलब्ध कराती है।

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