कागजी’ आदेशों की भेंट चढ़ता स्वास्थ्य केंद्र मिठौरा साहबों की ‘सेटिंग’ के आगे सिस्टम पस्त
रिपोर्ट:गजेंद्र गुप्त।
महराजगंज।जनपद के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मिठौरा (जगदौर) की सेहत खुद आईसीयू में नजर आ रही है। विडंबना देखिए कि जिस विभाग पर क्षयरोग (TB) मिटाने की जिम्मेदारी है, वही विभाग यहाँ ‘स्टाफ’ की कमी का मर्ज दूर नहीं कर पा रहा है। आलम यह है कि 82 ग्राम सभाओं की विशाल आबादी और मरीजों का बोझ पिछले 12 सालों से अकेले शिवेंद्र मिश्र (STS) के कंधों पर है। विभाग में तीन लोगों की जरूरत है, लेकिन यहाँ ‘एक ही काफी है’ वाली नीति चल रही है।

लेटर जारी होने और निरस्त होने का ‘खेला’
मिठौरा स्वास्थ्य केंद्र के साथ हो रही सौतेली व्यवहार की कहानी बड़ी दिलचस्प है। यहाँ के लिए जब भी किसी कर्मचारी की रवानगी का आदेश निकलता है, वह जगदौर पहुँचने से पहले ही ‘रास्ते’ से गायब हो जाता है। विभागीय गलियारों में चर्चा है कि ‘ऊपर’ की तगड़ी सेटिंग के कारण ज्वाइनिंग लेटर महज एक कागज का टुकड़ा बनकर रह जाता है। पूर्व में सुशील श्रीवास्तव का पत्र जारी हुआ, लेकिन वह ‘अदृश्य’ शक्तियों के कारण निरस्त हो गया।
10 अप्रैल का पत्र, 5 दिन बाद भी खामोशी!
ताजा मामला अजेंद्र प्रताप सिंह का है। जिला क्षयरोग अधिकारी कार्यालय ने 10 अप्रैल को पत्र जारी कर उन्हें TBHV के रूप में मिठौरा (जगदौर) में सप्ताह में तीन दिन (गुरुवार, शुक्रवार, शनिवार) सेवा देने का आदेश दिया। लेकिन साहब की ‘रफ्तार’ देखिए—5 दिन बीत चुके हैं, मगर मिठौरा की मिट्टी उन्हें अपनी ओर खींच नहीं पा रही है। अब सवाल यह है कि क्या अजेंद्र प्रताप सिंह अपनी ड्यूटी ज्वाइन करेंगे या फिर पुराने खिलाड़ियों की तरह अपनी ‘संबद्धता’ निरस्त कराने में कामयाब हो जाएंगे?
विभागीय ‘मिलीभगत’ या लापरवाही
हैरानी की बात यह है कि एक तरफ सरकार बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का ढिंढोरा पीट रही है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों की नाक के नीचे ‘लेटर-लेटर’ का खेल चल रहा है। 12 साल से एक ही कर्मचारी के भरोसे इतनी बड़ी आबादी को छोड़ देना क्या विभाग की सोची-समझी ‘उपेक्षा’ नहीं है? क्या स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों को मिठौरा का यह खालीपन दिखाई नहीं देता, या फिर ‘सैटिंग-गैटिंग’ के चश्मे ने उनकी नजर धुंधली कर दी है?
बड़ा सवाल यह हैं कि क्या मिठौरा (जगदौर) के मरीजों को कभी पूरा स्टाफ मिलेगा, या यहाँ की फाइलें सिर्फ लखनऊ और महराजगंज के दफ्तरों में ही दौड़ती रहेंगी? जनता देख रही है कि साहब कब अपनी कुर्सी छोड़कर मैदान में उतरते हैं।












