निचलौल थाना या अपराधियों का ‘सेफ हाउस’? आरोपी खा रहा कूलर की हवा, पीड़ित काट रहे चक्कर!
अपराधी को संरक्षण, पीड़ित को प्रताड़ना! क्या निचलौल पुलिस के लिए कानून से ऊपर है आरोपी मनमोहन?
रिपोर्ट:गजेन्द्र गुप्ता
महराजगंज। निचलौल थाना क्षेत्र में कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ती नजर आ रही हैं। ताजा मामलों ने पुलिस की कार्यप्रणाली को कटघरे में खड़ा कर दिया है, जहाँ खाकी पर अपराधियों को संरक्षण देने और पीड़ितों पर दबाव बनाने के गंभीर आरोप लग रहे हैं। मामला आरोपी मनमोहन गुप्ता को बचाने की पुलिसिया कवायद से जुड़ा है।
मामला 1: 2 लाख की चोरी और तहरीर बदलने का दबाव।
घटना बीते 3 मई 2026 की रात करीब 1 बजे की है। बरोहिया ढाला स्थित मुन्ना गुप्ता के मकान में बरोहिया निवासी मनमोहन गुप्ता पुत्र महातम गुप्ता संदिग्ध परिस्थितियों में घुसा, जिसे स्थानीय लोगों ने पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया। पीड़ित मुन्ना गुप्त ने 2 लाख रुपये की चोरी की लिखित तहरीर दी, लेकिन आरोप है कि पुलिस मुकदमा दर्ज करने के बजाय शिकायतकर्ता पर ही तहरीर बदलने का दबाव बना रही है।
हैरानी की बात यह है कि पुलिस आरोपी को गिरफ्तार करने के बजाय रोजाना थाने बुलाकर ‘कूलर की ठंडी हवा’ खिला रही है और शाम को ससम्मान घर भेज देती है। पुलिस की इस मेहरबानी से आरोपी के हौसले इतने बुलंद हैं कि वह थाने के भीतर ही पीड़ित पक्ष के सहयोगियों को धमकी दे रहा है और पुलिस मूकदर्शक बनी हुई है।
मामला 2: युवती का अश्लील वीडियो वायरल करने का आरोप।
अभी चोरी का मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था कि रविवार को एक अन्य युवती ने इसी आरोपी मनमोहन गुप्त पर अश्लील वीडियो बनाकर वायरल करने का संगीन आरोप लगाया। न्याय की उम्मीद में थाने पहुँची युवती के साथ भी वही हुआ—पुलिस ने रिपोर्ट दर्ज करने के बजाय उस पर भी तहरीर बदलने का दबाव बनाना शुरू कर दिया।
*सवालों के घेरे में खाकी: आखिर मेहरबानी क्यों?*
इन दोनों मामलों में निचलौल पुलिस की भूमिका संदिग्ध नजर आ रही है। आखिर एक ही आरोपी को बचाने के लिए पुलिस इतनी तत्पर क्यों है? इस संदर्भ में जब थानाध्यक्ष मदन मोहन मिश्र से बात की गई, तो उनका कहना है कि “मामला कुछ और है।”
बड़ा सवाल: अगर मामला कुछ और है, तो पुलिस उस ‘सच’ का खुलासा क्यों नहीं कर रही? क्या पुलिस किसी रसूखदार के दबाव में है या फिर अपराधियों से साठगांठ हो चुकी है?निचलौल पुलिस की यह सुस्ती और आरोपी के प्रति ‘नरम रुख’ पीड़ितों के विश्वास को तोड़ रहा है। यदि समय रहते उच्चाधिकारियों ने इस मामले का संज्ञान नहीं लिया और निष्पक्ष जांच नहीं हुई, तो पुलिस की छवि पर लगा यह दाग और गहरा होता जाएगा।












