नई दिल्ली। देशभर की अदालतों में बुनियादी सुविधाओं और न्यायिक ढांचे की कमी को दूर करने के लिए न्यायपालिका ने बड़ा कदम उठाया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की पहल पर एक महत्वपूर्ण ‘ज्यूडिशियल इंफ्रास्ट्रक्चर एडवाइजरी कमेटी’ का गठन किया गया है। इस समिति का उद्देश्य अदालतों में मौजूद इंफ्रास्ट्रक्चर की कमियों का आकलन करना और न्यायिक व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए व्यापक सुझाव देना है।
सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता में गठित पांच सदस्यीय समिति में कलकत्ता हाईकोर्ट के जज जस्टिस दिबांगशू बसाक, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के जज जस्टिस अश्वनी कुमार मिश्रा, बॉम्बे हाईकोर्ट के जज जस्टिस सोमशेखर सुंदरासन और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के डायरेक्टर जनरल को शामिल किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल को समिति का सदस्य सचिव बनाया गया है।
एक अनुमान के मुताबिक देशभर की अदालतों में बुनियादी ढांचे की कमी को दूर करने के लिए करीब 40 से 50 हजार करोड़ रुपये खर्च होने की संभावना है। इसी को ध्यान में रखते हुए समिति अदालतों की मौजूदा स्थिति का विस्तृत आॅडिट करेगी और न्यायिक ढांचे को आधुनिक बनाने के लिए ठोस रोडमैप तैयार करेगी।
समिति को 31 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। यह रिपोर्ट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य संजीव सान्याल को दी जाएगी।समिति अदालतों में जजों, वकीलों, वादकारियों और आम लोगों के लिए बेहतर सुविधाओं की जरूरतों का अध्ययन करेगी। इसके साथ ही मामलों के तेजी से निपटारे के लिए तकनीकी संसाधनों के उपयोग, ई-कोर्ट व्यवस्था को मजबूत करने, डिजिटलीकरण और कंप्यूटरीकरण को बढ़ावा देने पर भी विशेष जोर दिया जाएगा।
इसके अलावा आधुनिक कोर्ट कॉम्प्लेक्स विकसित करने, न्यायिक अधिकारियों और कोर्ट स्टाफ के कार्यस्थलों को बेहतर बनाने तथा आम नागरिकों को न्यायिक सेवाएं आसान और सुलभ बनाने पर भी समिति विशेष ध्यान देगी। न्यायपालिका की यह पहल देश की अदालतों को अधिक आधुनिक, पारदर्शी और तकनीक आधारित बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
न्याय व्यवस्था में सुधार को लेकर न्यायपालिका सख्त: सीजेआई ने बनाई इंफ्रास्ट्रक्चर कमेटी
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