नई दिल्ली । सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने पिता की संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर एक बेहद अहम और दूरगामी फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि यदि पिता की मृत्यु बिना वसीयत के होती है, तो बेटियां भी संपत्ति में बराबर की हकदार होंगी, भले ही बेटों ने पहले ही आपस में संपत्ति का बंटवारा क्यों न कर लिया हो।
शीर्ष अदालत का यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जिन्हें पारिवारिक संपत्ति में अक्सर उनके अधिकार से वंचित कर दिया जाता है।यह फैसला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एजी मसीह की पीठ ने सुनाया। अदालत ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत बेटी ‘क्लास-1 वारिस’ होती है और उसे पिता की संपत्ति में बेटों के बराबर अधिकार प्राप्त है।
क्या था पूरा मामला?
मामला कर्नाटक के निवासी बीएम सीनप्पा के परिवार से जुड़ा था। सीनप्पा की वर्ष 1985 में बिना वसीयत के मृत्यु हो गई थी। उनके पीछे पत्नी, तीन बेटियां और चार बेटे थे। पिता की मौत के बाद बेटों ने पहले मौखिक रूप से और फिर वर्ष 2000 में रजिस्टर्ड दस्तावेज के जरिए संपत्ति का बंटवारा कर लिया। आरोप है कि इस बंटवारे में तीनों बेटियों को शामिल ही नहीं किया गया और उन्हें कोई हिस्सा नहीं दिया गया।
इसके बाद वर्ष 2007 में बेटियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया और कहा कि पिता की मृत्यु बिना वसीयत हुई थी, इसलिए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के तहत वे भी बराबर की हिस्सेदार हैं।
हाईकोर्ट ने क्यों खारिज किया था दावा?
भाइयों ने अदालत में दलील दी कि संपत्ति का बंटवारा वर्ष 2000 में हो चुका था, यानी 20 दिसंबर 2004 से पहले, इसलिए यह धारा 6(5) के तहत सुरक्षित है। इसी आधार पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने बेटियों का दावा खारिज कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताते हुए कहा कि धारा 6(5) केवल पुराने बंटवारों को 2005 के संशोधन के प्रभाव से बचाती है, लेकिन इससे बेटियों का उत्तराधिकार का मूल अधिकार खत्म नहीं हो जाता।अदालत ने स्पष्ट किया कि बेटी का अधिकार केवल जन्म से मिलने वाले कॉपार्सनरी अधिकार तक सीमित नहीं है, बल्कि वह अपने पिता की संपत्ति में क्लास-1 उत्तराधिकारी के रूप में भी बराबर की हिस्सेदार है।सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह तय करना कि पुराना बंटवारा वैध था या नहीं और क्या वह बेटियों पर लागू होता है, यह एक तथ्यात्मक विवाद है, जिसकी जांच ट्रायल कोर्ट में सबूतों के आधार पर होगी।
हाईकोर्ट का आदेश रद्द, मामला फिर ट्रायल कोर्ट भेजा
शीर्ष अदालत ने अंत में कर्नाटक हाईकोर्ट के पुराने आदेश को रद्द कर दिया और मामले को दोबारा ट्रायल कोर्ट भेज दिया। साथ ही निर्देश दिया कि जब तक सुनवाई पूरी न हो, संपत्ति की वर्तमान स्थिति में कोई बदलाव न किया जाए।कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को और मजबूत करेगा तथा पारिवारिक संपत्ति विवादों में बेटियों की स्थिति को कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा।












